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बुजुर्गों की उपेक्षा

संयुक्त परिवार के बिखराव का सबसे बड़ा कुप्रभाव घर के बुजुर्गों पर पड़ा है।

elderघर में अपनों की उपेक्षा से परेशान बुजुर्ग। फाइल फोटो।

संयुक्त परिवार के बिखराव का सबसे बड़ा कुप्रभाव घर के बुजुर्गों पर पड़ा है। ग्रामीण स्तर पर तो थोड़ी इन्हें राहत भी है, लेकिन नगरीय जीवन की आपाधापी में अधिकतर बुजुर्ग घर के एक कोने में अपने दिन गिनते देखे जा सकते हैं। कुछ परिवार के कुछ समर्पित सदस्य आज भी अपने बुजुर्गों की देखभाल में कोई कोताही नहीं दिखाते हैं।

हालांकि इनकी संख्या मात्र गिनती की ही है। जो वरिष्ठजन नौकरी से निवृत्त होने पर अच्छी राशि प्राप्त किए रहते हैं, उनकी सेवा-सुश्रूषा और देखरेख में उनके परिवारगण प्राण-प्रण से लगे रहते हैं, लेकिन जो अर्थ के मामले में अपने बेटों पर आश्रित हैं, उनकी स्थिति दयनीय मानी जाती है। बुजुर्गों का एक वर्ग अपने जीवन के अंतिम अध्याय में अपनी चिकित्सा व्यवस्था और अन्य निजी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी पेंशन या लघु बचत योजनाओं में निवेश किए रहते हैं।

पिछले एक दशक से इन बचत योजनाओं में क्रमश: ब्याज दर में जिस रफ्तार से सरकार द्वारा कटौती की जा रही है, वह चिंताप्रद है। ऐसी बचत योजनाओं में निवेशकर्ताओं की संख्या अच्छी-खासी है जो उनके भरण-पोषण में एक महत्त्वपूर्ण सहारा माना जाता है। मार्च 2020 में रेल मंत्रालय ने वरिष्ठ नागरिकों को दी जा रही टिकट रियायती दर की सुविधा को समाप्त कर दिया।

केंद्र सरकार ने जनवरी 2020 से जुलाई 2021 तक सभी श्रेणी के कार्यरत कर्मियों एवं सेवानिवृत्तों के महंगाई भत्ते की किस्त कोरोना के कारण रोक दी। सेवानिवृत्तों में चतुर्थ वर्गीय या ग्रुप डी के कर्मियों का जीवन यापन का एकमात्र सहारा उनकी लघु पेंशन राशि होती है और फिर उम्रजनित शारीरिक बीमारियों पर खर्चे का भार अलग से। भारत सरकार को इस मामले में थोड़े विवेक से निर्णय लेकर ऐसे सेवानिवृत्तों का महंगाई भत्ता नहीं रोकना चाहिए था।
’अशोक कुमार, पटना, बिहार

नैतिकता के परिप्रेक्ष्य

एक समय पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को वरीयता मिलती थी। नैतिक शिक्षा की पुस्तकों में प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से यह सिखाया जाता था कि हमें अपने जीवन में किन आदर्शों को आत्मसात करना है। इन आदर्शों में सत्य, ईमानदारी, सहनशीलता, विनम्रता, संवेदनशीलता, गुरु सेवा, माता-पिता का आदर, मित्रता, दया और दान जैसे मूल्य होते थे।

समय बीतने के साथ नैतिक शिक्षा अनिवार्य शिक्षा पाठ्यक्रम से बाहर हो गई। अब न तो विद्यालयों में नैतिक शिक्षा दी जा रही है और न ही अभिभावकों के पास उसके लिए समय है कि वे बच्चों को ये संस्कार दे सकें। वे अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में ही व्यस्त हैं। इस प्रकार नैतिकता परिदृश्य से गायब होती जा रही है।

सत्य यही है कि बिना नैतिक शिक्षा के एक अच्छे व्यक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है। एक ओर नैतिक शिक्षा का अभाव हो रहा है तो दूसरी ओर इंटरनेट एवं इंटरनेट मीडिया के दुरुपयोग ने बंटाधार किया हुआ है। पहले संयुक्त परिवार में बुजुर्ग अपनी अगली पीढ़ी को कहानियों के माध्यम से अच्छी बातें सिखाते थे। जब से एकल परिवार हुए हैं, यह सब भी बंद हो गया है। वास्तव में नैतिक शिक्षा ही नैतिक मूल्यों को परिवर्तित करती है।

नैतिक मूल्यों से व्यक्ति चरित्रवान बनता है। सदाचार ही व्यक्ति को देवत्व की ओर ले जाता है। हमारे समक्ष अनेक उदाहरण हैं जिनका व्यक्तित्व सही मायनों में आदर्श रहा। उनका आदर्श होना उनके बाल्यकाल में मिली नैतिक शिक्षा और प्रशिक्षण से ही संभव हो सका। आज भी समय है हम अपनी नई पीढ़ी को सत्य, त्याग, विनम्रता, सहनशीलता, करुणा, ईमानदारी और उदारता से ओतप्रोत पाठ पढ़ाएं, ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल बन सके।
’सौरव कुमार चौधरी, गोरखपुर, उप्र

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