समानता की अनदेखी

सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि हमारे सरकारी स्कूलों में अध्यापकों का भारी अभाव है और जहां पर बीस-पच्चीस बच्चों पर एक अध्यापक होना चाहिए, वहां अस्सी और सौ बच्चों पर एक अध्यापक की नियुक्ति की जाती है।

unequalness, gender partialityसमाज में भेदभाव से असमानता आती है, जो अंतत: समाज को ही नुकसान पहुंचाती है।

‘समान शिक्षा का सपना’ (लेख, 14 अप्रैल) पढ़ा। हमारे देश में अगर शिक्षा नीति एक समान हो जाए तो समाज में समानता की बात आवश्यक रूप से हो जाएगी। शिक्षा नीति समान होने के कारण एक मजदूर, गरीब तथा एक बड़े नौकरशाह, नेता और उद्योगपति का बच्चा एक स्कूल में शिक्षा ग्रहण करेगा तो उसके कारण समान नीति समावेशी उत्थान की तरफ बढ़ जाएगी। समान शिक्षा नीति की मांग समय-समय पर हमारे समाज सुधारकों ने उठाई है। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर भी यही चाहते थे कि शिक्षा नीति में एक समान हो। कई बार राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने इसके लिए विभिन्न प्रकार की समितियां और आयोगों का गठन भी किया। चुनाव के समय आम जनता से इस मसले पर विभिन्न प्रकार के वादे भी किए गए, लेकिन जब आयोगों और समितियों की रिपोर्ट या सिफारिशें आई तो उस पर अमल करना जरूरी नहीं समझा गया।

आज भी सरकारी स्कूलों में अक्सर जिस प्रकार से प्रयोगशाला से लेकर पीने के पानी और बैठने की व्यवस्था तक का भेदभाव की खबरें आ जाती हैं। बदलते हुए समय के अनुसार विभिन्न प्रकार के संचार के साधनों का भी अभाव और उसके साथ-साथ कंप्यूटर प्रणाली के युग में कंप्यूटरों का अभाव पाया जाता है। इस प्रकार की शिक्षा नीति में गरीब और मजदूर, अल्पसंख्यक पिछड़े वर्ग के परिवारों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं, तो उसकी गुणवत्ता क्या होगी।

समय-समय पर हो रहे सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि हमारे सरकारी स्कूलों में अध्यापकों का भारी अभाव है और जहां पर बीस-पच्चीस बच्चों पर एक अध्यापक होना चाहिए, वहां अस्सी और सौ बच्चों पर एक अध्यापक की नियुक्ति की जाती है। अधिकतर स्कूल अध्यापकों की भारी कमी के बीच चल रहे हैं। इस तरह से समान शिक्षा नीति का सपना कैसे पूरा हो सकता है।
’विजय कुमार धनिया, दिल्ली

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