इतिहास के नायक

भारत के संविधान निर्माता, चिंतक और समाज सुधारक डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन सामाजिक बुराइयों, जैसे- छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया।

Dr Ambedkarसांकेतिक फोटो।

भारत के संविधान निर्माता, चिंतक और समाज सुधारक डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपना पूरा जीवन सामाजिक बुराइयों, जैसे- छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ संघर्ष में लगा दिया। इस दौरान बाबा साहेब गरीब, दलितों और शोषितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे। डॉ भीमराव आंबेडकर के विचार और सिद्धांत उनके बाद आज भी भारतीय राजनीति के लिए हमेशा प्रासंगिक रहे हैं।

वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के चाहते थे, जिसमें राज्य सभी को समान अवसर दें और धर्म, जाति, रंग तथा लिंग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। वे कहते थे कि जब तक आर्थिक और सामाजिक विषमता समाप्त नहीं होगी, तब तक जनतंत्र की स्थापना अपने असली रूप को नहीं पा सकेगी। जब तक सामाजिक जनतंत्र स्थापित नहीं होता है, तब तक सामाजिक चेतना का विकास संभव नहीं हो पाता है।

डॉ आंबेडकर का मानना था कि समानता का अधिकार धर्म और जाति से ऊपर होना चाहिए। हम मनुष्यों द्वारा बनाई गई असमानता में एक वर्ग, रंग और जाति का व्यक्ति अपने आप को अन्य से श्रेष्ठ समझ कर संसाधनों पर अपना अधिकार जमाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता का अधिकार का प्रावधान करते हुए समान अवसरों की बात कही गई है। अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जिन संस्थानों को स्वतंत्रता के बाद स्थापित किया गया, उनकी स्थापना में डॉ आंबेडकर का अहम योगदान रहा। इनमें भारतीय रिजर्व बैंक भी शामिल है।

बाबा साहेब आंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था को अवैज्ञानिक, अत्याचारपूर्ण, संकीर्ण और गरिमाहीन बताते हुए इसकी कटु आलोचना की थी। इन भेदभावों के खिलाफ उन्होंने व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों के द्वारा पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिए मुहैया कराने का संघर्ष किया। उनका मानना था कि स्त्रियों के सम्मानपूर्वक और स्वतंत्र जीवन के लिए शिक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम विधिमंत्री रहते हुए ‘हिंदू कोड बिल’ संसद में प्रस्तुत किया और हिंदू स्त्रियों के लिए न्यायसम्मत व्यवस्था बनाने के लिए व्यापक प्रावधान सामने रखे। हिंदू कोड बिल मसौदे को रोके जाने पर उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

उनका विश्वास था कि शिक्षा ही व्यक्ति में यह समझ विकसित करती है कि वह अन्य से अलग नहीं है, उसके भी समान अधिकार हैं। उन्होंने एक ऐसे राज्य के निर्माण की बात रखी, जहां समूचा समाज शिक्षित हो। वे मानते थे कि शिक्षा ही व्यक्ति को अंधविश्वास, झूठ और आडंबर से दूर करती है। शिक्षा का उद्देश्य लोगों में नैतिकता और जनकल्याण की भावना विकसित करने का होना चाहिए।

उन्होंने सामाजिक चिंतन के माध्यम से दलितों और शोषित वर्गों के उत्थान के लिए काफी योगदान दिया। वे उनके उत्थान के माध्यम से एक ऐसा आदर्श समाज स्थापित करना चाहते थे, जिसमें समानता, स्वतंत्रता तथा भ्रातृत्व के तत्त्व समाज के आधारभूत सिद्धांत हों। अगर उनके विचारों को अमल में लाएं तो समाज की ज्यादातर समस्याएं जैसे वर्ण, जाति, लिंग, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक सभी पहलुओं पर पैनी नजर रखी जा सकती है।
’प्रत्यूष शर्मा, हमीरपुर, हिप्र

वोट की कीमत

भारत में लंबे समय से जाति लिंग, धर्म, आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव किया जाता रहा है, जो पूरी तरह से अतार्किक और अमानवीय है। कोई भी व्यक्ति किस जाति और धर्म में पैदा होगा, महिला या पुरुष होगा, वह खुद तय नहीं करता। संयोग से हुई किसी चीज पर न तो घमंड किया जा सकता है और न ही दूसरे को हीन समझा जा सकता है। आप किसी भी जाति या धर्म में पैदा हुए हों, पुरुष हों या महिला, आपकी आर्थिक स्थिति कैसी भी क्यों न हो, सभी लोगों के वोट का मूल्य एक ही होगा।

यही चीज वोट को बहुमूल्य बनाती है। दूसरी बात, अगर कोई प्रत्याशी आपके वोट को खरीद सकता है तो आपको बेच भी सकता है। मान लीजिए कि आपने अपने वोट को बेच दिया तो क्या आप नैतिक रूप से पांच साल तक किए गए गलत कार्यों के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाएंगे? ऐसा आप नहीं कर पाएंगे। अगर आपने वोट को नहीं बेचा है तो आप पांच साल तक अपने प्रतिनिधि से सवाल पूछ सकते हैं। इस योजना में इतना पैसा आया तो कहां खर्च हुआ, इसका हिसाब मांग सकते हैं। आरटीआइ के तहत भी जानकारी ले सकते हैं। प्रधान तक को भी हटवा सकते हैं। यह आपके वोट की कीमत है।

तीसरी बात कि आप ठीक-ठाक शिक्षित कर्मठ समझदार व्यक्ति को वोट देंगे तो हो सकता है कि पांच साल तक आपके गांव में समरसता और भाईचारा बना रहे। विकास की योजनाएं आपके तक बिना कमीशन की पहुंच सकें, वाजिब लोगों को योजनाओं का लाभ मिल सके। यह सिर्फ आपके वोट पर निर्भर करता है। फिर आपके वोट की कीमत है कि प्रत्याशी वोट के लिए आपके दरवाजे पर आता है, आपसे हाथ जोड़ता है, कभी पैर पकड़ता है। दरअसल, आपके ही वोट से ही वह प्रधान, विधायक, सांसद से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर तय करता है। इसलिए वोट का प्रयोग सोच-समझ कर करें।
’उत्कर्ष जायसवाल, बनारस, उप्र

भेदभाव का तंत्र

चार अप्रैल 1968 को जब मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या हुई थी तो लगा था कि अब अमेरिकी समाज बदल जाएगा। मगर वह सब सपना था। हकीकत में अश्वेतों को उसी तरह का भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है, जिसके खिलाफ मार्टिन लूथर किंग ने आवाज बुलंद किया था। सैकड़ों कालों को गोरे पुलिस वालों ने जान से मार डाला।

पिछले साल जब जॉर्ज फ्लॉयड को श्वेत राष्ट्रवाद का शिकार बनाया गया, उसके बाद जो तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी, उससे लगा कि अब ऐसा नहीं होगा। लेकिन रविवार ग्यारह अप्रैल को फिर उसी मिनिओपोलिस क्षेत्र में गाड़ी चलाते हुए बीस वर्षीय युवक डॉन्टिंग राइट को गोली मार दी गई। पता नहीं, गोरों को यह अधिकार कहां से मिला हुआ है कि वे जब चाहें, जहां चाहे कालों को मार सकते हैं। देश का कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह किस तरह का लोकतंत्र है?
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

संकट काल में

कोरोना काल और पूर्णबंदी के दौरान कुछ महाजनों द्वारा जीवनरक्षक दवाइयों और अनिवार्य आवश्यकता की वस्तुओं का मनमाना दाम वसूला जा रहा है, जबकि इस समय महाजनों को अपनी उपयोगिता और सार्थकता सिद्ध करना चाहिए। यह मान लिया जा सकता है कि वे घाटा न उठाएं, लेकिन मुनाफा कम लेकर भी वस्तु बेचने की कसम ली जा सकती है। मुनाफाखोरी, कालाबाजारी में जो व्यक्ति लिप्त है, वह महाजन नहीं, बल्कि निकृष्ट है। यह समय धन कमाने का नहीं, बल्कि तन, मन और धन से मानव सेवा करने का है। इसलिए जिसके पास जो है, उसका मानव सेवा में उपयोग कर खुद को कृतार्थ करें।
’बीएल शर्मा ‘अकिंचन’, उज्जैन, मप्र

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