खतरे का ढांचा

हाल ही में यह खबर आई कि अमेरिका ने चीन के कंप्यूटर निर्माताओं पर प्रतिबंध लगाए। इसके मुताबिक चीनी सेना हथियारों के विकास में इन कंपनियों के सुपर कंप्यूटरों का इस्तेमाल करती है।

superसांकेतिक फोटो।

हाल ही में यह खबर आई कि अमेरिका ने चीन के कंप्यूटर निर्माताओं पर प्रतिबंध लगाए। इसके मुताबिक चीनी सेना हथियारों के विकास में इन कंपनियों के सुपर कंप्यूटरों का इस्तेमाल करती है। देखा जाए तो वर्तमान में परमाणु, जैव और रासायनिक हथियार प्रणाली के इस्तेमाल की सोच ज्यादा विकसित हो रही है। जैव प्रयोग द्वरा विषाणु या जीवाणु दुश्मन के खेमे के वायुमंडल में महामारी फैलाने का काम सरलता से किया जा सकता है। एक जानकारी के मुताबिक राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ वायरॉलॉजी) के मत के अनुसार जैवीय संरचना के बारे में जानकारी अति महत्त्वपूर्ण होती है। इससे प्राप्त आंकड़ों का प्रयोग जैवीय संरचना बदलने में भी किया जा सकता है।

इसी कारण कोई देश जैवीय संरचना संबंधी जानकारी अन्य देशों को नहीं देते। इसलिए परमाणु, जैव रासायनिक हथियारों के प्रयोग में काम आने वाली सामग्रियों को पूर्णतया गोपनीय रख कर विशेष सतर्कता बरती जाती है और बरती भी जानी चाहिए। इनके प्रयोग पर प्रतिबद्ध नियमों को ध्यान में रखते हुए। अब तक जैसी जानकारी सामने आई है, अगर वह सही है तो चीन अपनी प्रयोगशाला में वायरसों को इकट्ठा करके रखने का खमियाजा खुद भी उठा रहा है और अन्य देश भी संक्रमित होकर अब तक जूझ रहे हैं। चीन की गलती बहुत सारे देशों को कई साल पीछे ले गई।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’, धार, मप्र

फिर त्रासदी

मानवता फिर से शर्मसार न हो, इसके लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। ठीक है कि अस्पताल में बिस्तर, आॅक्सीजन नहीं है, लेकिन सरकार के पास सरकारी खजाना और उसकी चाभी तो है! जो भी प्रवासी श्रमिक अपने घर वापस जाना चाहते हैं, उनकी जांच कर उन्हें सम्मान से उनके घर वापस भेजने का प्रबंध करना सरकार की जिम्मेदारी है, किसी एनजीओ की नहीं।

करीब हर प्रदेश के अपने राज्य परिवहन हैं, सरकारें संसाधन का बहाना नहीं बना सकती। दिल्ली, मुंबई का नकारापन और बेरहमी का दर्द भूले नहीं ये लोग। एक खामोशी और सिहरन… पिछला बुरा अनुभव फिर से उन्हें सब कुछ समेट कर सड़क नापने को मजबूर कर रहा है।
सरकारों को ध्यान देना चाहिए कि फिर कोई गर्भवती महिला सड़क पर न दिखे, न कोई अबोध बालक मृत माता की छाती से अपने जीवन के वजूद के लिए दो बूंद दूध के लिए संघर्षरत दिखे।
’अरुण कुमार गुप्ता, दिल्ली

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