आवेश का हासिल

मनुष्य जीवन में आवेश उत्पन होना स्वाभाविक है। मनुष्य में आवेशों की उत्पत्ति का कारण बनने वाले प्रमुख कारक उसकी परिस्थितियां, कर्म, विचार और उसकी वाणी होते हैं। मनुष्य द्वारा इन कारकों के माध्यम से उत्पन्न आवेशों पर नियंत्रण करना अनिवार्य है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है, तो आवेश उसके जीवन के लिए […]

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पुरुष महिलाओं से बड़े मूर्ख होते हैं। (Source: Thinkstock Images)

मनुष्य जीवन में आवेश उत्पन होना स्वाभाविक है। मनुष्य में आवेशों की उत्पत्ति का कारण बनने वाले प्रमुख कारक उसकी परिस्थितियां, कर्म, विचार और उसकी वाणी होते हैं। मनुष्य द्वारा इन कारकों के माध्यम से उत्पन्न आवेशों पर नियंत्रण करना अनिवार्य है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है, तो आवेश उसके जीवन के लिए घातक सिद्ध होते हैं। इसलिए आवेश मनुष्य के लिए विष के समान होता है और इस विष के कुप्रभाव से बचाव के लिए उसके द्वारा आवेशों से मुक्त रहने के स्थायी उपाय करने अनिवार्य हैं।

होरेस फ्लैचर के अनुसार- ‘क्रोध और चिंता व्यक्ति को निराश और असमर्थ बना देता है। कभी-कभी यही उसकी मृत्यु का कारण बन जाते है।’ क्रोध और चिंता ऐसे अवगुण या आवेश होते हैं, जिनसे उत्पन्न परिस्थितियों में मनुष्य आत्महत्या करने पर विवश हो जा सकता है। क्रोध का आवेश अधिक देर तक नहीं रहता। कुछ समय के बाद अपने आप ही शांत हो जाता है। इसलिए आवश्यक है कि जब क्रोध रूपी आवेश उत्पन हो, तो व्यक्ति शांत रहे। उसकी यही शांति क्रोध को शांत करने में सहयोग देगी। ऐसी स्थिति में मनुष्य क्रोध के कारणों पर विचार करने पर बाध्य होगा, तब न तो वह खुद आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होगा, न किसी अन्य व्यक्ति की हत्या करने का प्रयास करेगा।

जब क्रोध शांत होता है, तो मनुष्य को अपनी भूल का ज्ञान हो जाता है। ऐसा तभी संभव है, जब मनुष्य में आत्म नियंत्रण की विलक्षण शक्ति का वास हो। अगर मनुष्य में यह गुण पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होता है, तो क्रोध शांत होने पर वह क्षमा याचना के लिए भी तैयार हो जाता है और इस तरह क्रोध की मार से बचा रहता है।
’पलक त्रिवेदी, उन्नाव, उप्र

आभासी प्रतिद्वंद्विता
जी-सात समूह का बैठक समाप्त होने के तुरंत बाद चीन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा- ‘एक छोटा-सा समूह विश्व को अपने हिसाब से नहीं चला सकता’। बात सही भी है। देखा जाए तो पहले के ही बैठकों के ही समान इस बार भी केवल भाषण ही हुआ। ठोस कुछ भी नहीं। बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि इस बार का इनका एजंडा ही था चीन का विरोध। चीन का बेल्ट और सड़क पहल जैसा विकल्प बनाने का संकल्प। चीन जैसा पूंजी निवेश तीसरे विश्व के देशों में करने का वादा। मतलब चीन जो कर चुका है, वही यह समूह करने की बात अब कर रहा है।

हकीकत यही है कि चीन भारत और यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार बन चुका है। अफ्रीका के चौवन देशों में से अड़तालीस में चीन निवेश कर चुका है। उसका मुकाबला फिलहाल असंभव है। हालांकि माना यह जा रहा था कि टीके को लेकर पेटेंट कानून में छूट देने का ठोस निर्णय लिया जाएगा। मगर बैठक में एक अरब टीका दान में देने की बात की गई। उससे विश्व का समूची आबादी को टीका कभी नहीं लग पाएगा। लेकिन इस बहाने जो नई व्यवस्था बनाने की कोशिश हो रही है, उसके बारे में यह कहना मुश्किल है कि उससे यह दुनिया बनेगी या बिगड़ेगी!
’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर, झारखंड

जोखिम में बच्चे
कोरोना की दूसरी लहर से अनाथ हुए बच्चों को हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं- एक जो नजदीकी रिश्तेदारों के सहारे हैं और दूसरे, वे जिनका या तो कोई नजदीकी नहीं है या फिर कोई उनका संरक्षण नहीं ले रहा। दोनों ही श्रेणियों के बच्चों को एक पारिवारिक माहौल चाहिए, जहां उनका स्नेहपूर्ण तरीके से पालन-पोषण हो सके। केंद्र और राज्य सरकारों ने इन बच्चों के लिए पेंशन, मुफ्त शिक्षा, एकमुश्त राशि जैसी अनेक घोषणाएं की हैं। हो सकता है कि इन सुविधाओं के बाद रिश्तेदार इन बच्चों को रख तो लें, लेकिन उन पर पूरा ध्यान न दें, उनसे भेदभाव हो, वे घरेलू कामों में उलझे रहें।

यह डर भी है कि गोद देने के नाम पर फर्जी एनजीओ इन बच्चों को मानव तस्करों के सुपुर्द कर दें। इसलिए इन बच्चों की पहचान और परवरिश सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय डाटा बैंक बना कर इन्हें आधार जैसा एक पहचान पत्र दिया जाए। राज्यों के बाल अधिकार संरक्षण आयोग इन बच्चों के बालिग होने तक इनकी नियमित निगरानी भी करें।
’बृजेश माथुर, गाजियाबाद, उप्र

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