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औपचारिकता से आगे

सामाजिक समरसता और सादगी के प्रतीक सुंदरलाल बहुगुणा आज हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उन्होंने धरती की हरियाली को बचाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे युगपुरुष को हार्दिक श्रद्धांजलि। वे चिपको आंदोलन के समर्थक थे और उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के संदेश को सुदूर देशों तक पहुंचाया।

चिपको आंदोलन के प्रणेता और पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा। (Express photo by Jaipal Singh/File)

जून का महीना नजदीक है। साल भर से सुप्त पड़ा पर्यावरण संरक्षण का जिन्न फिर जाग उठेगा। आयोजन, गोष्ठियां, नीतियां, रैलियां और कार्यक्रमों की बाढ़ देख कर सोया हुआ पर्यावरण भी उम्मीद लिए आंख खोल बैठेगा। अपनी इस आवाभगत पर हैरान होगा। मगर अफसोस कि कुछ ही समय बाद हम फिर इस मसले से आंख चुरा कर नींद में सो जाएंगे।? जंगलों में आग लगती रहेगी, पेड़ कटते रहेंगे। हम शोर मचाते रहेंगे। राजनीति करते रहेंगे।

सामाजिक समरसता और सादगी के प्रतीक सुंदरलाल बहुगुणा आज हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उन्होंने धरती की हरियाली को बचाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे युगपुरुष को हार्दिक श्रद्धांजलि। वे चिपको आंदोलन के समर्थक थे और उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के संदेश को सुदूर देशों तक पहुंचाया। वे दलित उत्थान, भूदान, वन संरक्षण, टिहरी बांध का विरोध, महिला सशक्तिकरण, शराब का विरोध जैसे कई आंदोलनों के अग्रदूत थे। जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए उन्होंने मीलों की पदयात्राएं की। पद्म विभूषण जैसे सम्मान भी जिनके व्यक्तित्व की विशालता के सामने बौने प्रतीत होते हैं, ऐसे पर्यावरण प्रहरी के दिखाए सन्मार्ग पर चल कर हम अपने पर्यावरण को बचा सकते हैं।

लेकिन वे हमें अपनी सुविधा के वक्त ही याद आएंगे। बेहतर होता कि हर व्यक्ति सिर्फ एक ही पेड़ लगाता और वर्ष भर उसे खाद पानी देता, देखभाल करता। कभी प्यार से सहला लेता। अगर हम अपने घर में कुछ कम निर्माण कर थोड़ी खुली जगह पेड़-पौधों के लिए छोड़ दें तो हरियाली का संसार ढूंढ़ने बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

आज हम पर्यावरण को नजरअंदाज करने की भारी कीमत चुका रहे हैं। अगर अभी भी सचेत नहीं हुए तो न जाने क्या होगा! खबरें ऐसी भी आ रही हैं कि संक्रमण की तीसरी लहर आएगी जो इन दोनों से कहीं अधिक खतरनाक होगी। हवा और दवा के बगैर होने वाली एक-एक मौत इंसानियत के माथे पर कलंक के तौर पर याद की जाएगी।
जून महीने में ही हम योग दिवस भी मनाते हैं। क्या ही अच्छा होगा अगर दिन विशेष के शोर-शराबे के बजाए योग को जीवन का आधार बना कर अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें। योग साधना में अपार शक्ति है बीमारियों से लड़ने की। बात छोटी-सी है। कुछ खर्च भी नहीं करना है।
’अमृता पांडे, हल्द्वानी, उत्तराखंड

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