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घरेलू हिंसा की मार

घरेलू हिंसा के लिए पुरुष ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उस घर की उम्रदराज महिलाएं भी उतनी ही जिम्मेदार हैं। ऐसे हजारों परिवार है जहां बहुएं देवर, जेठ या ससुर के हाथों ही प्रताड़ित नहीं हैं, बल्कि सास, ननद और जेठानी की प्रताड़ना की शिकार हैं।

आज भी महिलाएं हाशिए पर जीने को मजबूर। फाइल फोटो।

वर्ष 2005 में जब घरेलू हिंसा के खिलाफ केंद्र सरकार ने कानून बनाया था तो यह उम्मीद जगी थी कि अब महिलाओं को इस पीड़ा से छुटकारा मिलने लगेगा। लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में परिवार के सदस्यों और करीबी रिश्तेदारों के जरिए छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ी हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रपट के मुताबिक भारत में पंद्रह से उनचास साल की सत्तर फीसद महिलाएं किसी न किसी रूप में हिंसा की शिकार हैं। इनमें घर में रहने वाली महिलाओं की स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि भारत में हर रोज हर छब्बीस वें मिनट में एक महिला का किसी न किसी रूप में उत्पीड़न किया जाता है। हर तियालीस मिनट में अपहरण, चौंतीस वें मिनट में बलात्कार, बयालीस वें मिनट में यौन उत्पीड़न और हर तिरानवे वें मिनट में कोई न कोई महिला जला दी जाती है। इससे यह साबित होता है कि महिलाओं की स्थिति ज्यादा बदतर हुई है। यह तब है जब ज्यादातर मामले थाने में दर्ज ही नहीं कराए जाते।

दरअसल, घरेलू हिंसा के लिए पुरुष ही जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि उस घर की उम्रदराज महिलाएं भी उतनी ही जिम्मेदार हैं। ऐसे हजारों परिवार है जहां बहुएं देवर, जेठ या ससुर के हाथों ही प्रताड़ित नहीं हैं, बल्कि सास, ननद और जेठानी की प्रताड़ना की शिकार हैं। ऐसे घरों की बहुएं ससुराल और मायके की इज्जत के सवाल पर चुपचाप सब कुछ सहती रहती हैं। इस लिए महिला सुरक्षा के लिए बना घरेलू कानून का उनके लिए कोई खास मायने नहीं रह गया है। संपन्न और पढ़े-लिखे होने का दावा करने वाले परिवारों में महिला भी घरेलू हिंसा की घटनाएं कम नहीं हैं। तमाम महिलाएं अपनी स्थिति के प्रति जागरूक तो हैं और वे घरेलू हिंसा को पूरी तरह़ खत्म भी करना चाहतीं हैं, लेकिन कानून का सहारा लेने में किसी न किसी वजह से झिझकती हैं।

नए दौर में यह सवाल मौजूं लगता है कि विकास की दौड़ में महिलाओं की हालत क्या है? क्या वे मजहब की पुरानी बंदिशों से छूट पाई हैं? क्या उनके प्रति पुरुष वर्ग के नजरिये में बदलाव आया है? यदि बदलाव आया है तो किस स्तर तक? आंकड़े और अनुभव बताते हैं कि शहर की महिलाओं में पहले की अपेक्षा काफी कुछ बदलाव आया है, लेकिन ग्रामीण इलाकों की महिलाएं आज भी घरेलू हिंसा और सामाजिक हिंसा की शिकार हैं। सम्मान के नाम पर होने वाली हत्या के मामले में हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान के अलावा अब तमिलनाडु और दूसरे राज्यों में ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही हैं। इसमें भी पुरुषों के साथ परिवार की महिलाओं का बड़ा हाथ होता है। इसी प्रकार गर्भवती महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार बहुत बड़े पैमाने पर होती हैं। गर्भकाल में उनसे जबरन कार्य करवाना, घर के कामों की जिम्मेदारियां को निभाने के लिए मजबूर करना, विवाह के पहले और बाद में उनके साथ घिघौना व्यवहार करना और बाल विवाह के दंश को सहने के लिए मजबूर होने जैसे मामले आज भी बड़ी तादाद में हमारे महिलाओं के उत्पीड़न की कहानी कहते हैं।

कहने को तो देश लोकतांत्रिक है। सब को बराबर का अधिकार है। आगे बढ़ने में किसी भी स्त्री-पुरुष को कोई बंदिशें नहीं हैं। लेकिन परिवार और समाज में जो बंदिशें महिलाओं पर हैं, वे भी किसी हिंसा से कम नहीं हैं। इस लिए बड़े स्तर पर आज भी समाज को जागरूक करने की आवष्यकता है। जब तक परिवारों में महिलाओं को कुटुंबी संपत्ति माना जाता रहेगा, तब तक हालात में बदलाव नामुमकिन है।
’शकुंतला देवी, नांगलोई, दिल्ली

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