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समांतर कदम

महिलाओं को अपने जीवन में अपने लिए भी कुछ करना चाहिए। समाज में अपनी पहचान बनानी चाहिए। केवल परिवार तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहिए, क्योंकि योग्य और प्रतिभाशाली महिलाओं से ही समाज मजबूत बनेगा।

crime, crime newsसांकेतिक तस्वीर। फोटो सोर्स- एक्सप्रेस अर्काइव

आधुनिक महिलाओं को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- गृहिणी और नौकरी पेशा या व्यवसाय। आजकल नौकरी या व्यवसाय करने वाली महिलाओं को सम्मान की दृदिृ से देखा जाता है और केवल घर संभालने वाली गृहिणी को बहुत ही साधारण दृष्टि से। जबकि एक गृहिणी होना कितना कठिन है, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाता। फर्क सिर्फ यह है कि गृहिणी के काम का आर्थिक मूल्य नहीं आंका जाता।

संघर्ष दोनों ही स्त्री को करना पड़ता है, वह चाहे गृहिणी हो या नौकरीपेशा। नौकरी करने वाली स्त्रियों को भी घर और दफ्तर, दोनों को संभालना पड़ता है। अपने परिवार के साथ समय बिताने का भी समय नहीं होता उनके पास। फिर भी एक संतोष होता है, अपने सपने को पूरा कर पाने का। इसलिए वे घर-बाहर दोनों जगह जूझती रहती हैं। अपनी कमाई का पैसा जब उनके हाथों में आता है तो उनके चेहरे पर आत्मसंतोष और आत्मविश्वास की एक अलग ही चमक होती है।

उन्हें अपने खर्च के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। लेकिन गृहिणी! वह तो अपना पूरा समय अपने परिवार को संभालने में ही लगा देती है, फिर भी आर्थिक मूल्य तो दूर, सराहना का एक शब्द नहीं मिलता। अपने खर्चे के लिए भी उसे अपने पति या सास-ससुर पर ही आश्रित रहना पड़ता है। वे जो दे दें, उसी से उसे संतोष करना पड़ता है। भावनाओं और संबंधों की गरिमा का हवाला देकर परिवार में कामकाज के आर्थिक मूल्य की बात को खराब माना जाता है।

एक पढ़ी-लिखी स्त्री को जब विवाह के बाद नौकरी करने से मना कर दिया जाता है और यह समझाया जाता है कि अब घर संभालना ही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, तब कई बार अपने सपनों का बलिदान देकर स्त्रियां घर परिवार की जिम्मेदारी संभालने को ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेती हैं। घर को सजाना-संवारना, परिवार के सदस्यों के लिए पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन बनाना, घर को साफ-सुथरा रखना, घर के हरेक सदस्य का खयाल रखना, छोटे बजट में भी घर को सुचारु रूप से चला लेना। ये सब एक कुशल गृहिणी के गुण माने जाते हैं।

एक पढ़ी-लिखी और कुछ बनने का सपना देखने वाली महिला जब मात्र एक गृहिणी बन कर रह जाती है तो उसके मन में कहीं न कहीं एक टीस कुलबुलाती रहती है कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाई और बच्चों के बड़ा होने पर जब वह अपने सपनों को साकार करना चाहती है, अपने शौक को पूरा करना चाहती है या अपनी प्रतिभा के द्वारा नाम कमाना चाहती है, तो भी परिवार के सदस्य उसमें रोड़े अटकाते हैं, क्योंकि उन्हें आदत पड़ी होती है उसके पूरे समय पर, उसके तन-मन पर अधिकार जताने की। बहुत कम ही पुरुष ऐसे होंगे जो अपनी पत्नी को हर तरह से पूरा सहयोग देते हों।

लेकिन आज महिलाएं बहुत जागरूक हो रही हैं। अब वे विवाह के बाद एक परिपक्व समझदारी के साथ यह फैसला ले सकती हैं। समय और सही अवसर मिलने पर किसी की रोक-टोक पर ध्यान न देते हुए महिलाओं को अपने जीवन में अपने लिए भी कुछ करना चाहिए। समाज में अपनी पहचान बनानी चाहिए। केवल परिवार तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहिए, क्योंकि योग्य और प्रतिभाशाली महिलाओं से ही समाज मजबूत बनेगा।
’रंजना मिश्रा, कानपुर, उप्र

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