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भ्रम की स्थिति

हाल ही में मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में रात के कर्फ्यू का समर्थन किया गया। लेकिन रात में कर्फ्यू लगाने का औचित्य क्या है, यह समझना मुश्किल है।

हाल ही में मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में रात के कर्फ्यू का समर्थन किया गया। लेकिन रात में कर्फ्यू लगाने का औचित्य क्या है, यह समझना मुश्किल है। यह जनता में भ्रम और पूर्णबंदी का डर पैदा करेगा। भले ही यह कहा जा रहा हो कि पूर्णबंदी नहीं लगाई जाएगी, मगर वर्तमान हालात पर नजर डालें तो जहां-जहां रात का कर्फ्यू लगाया गया, वहां बाद में पूर्णबंदी भी लागू कर दी गई। पिछले अनुभव बताते हैं कि अब लोगों को महामारी से ज्यादा पूर्णबंदी सताती है। देश के कुछ हिस्सों से, खासतौर पर दिल्ली और मुंबई से आ रही पलायन की खबरें इसका सबूत हैं।

अगर कहा जाता है कि कोरोना भीड़ से ज्यादा फैलता है, तो भीड़ को नियंत्रित करने की जरूरत है। लेकिन इस मोर्चे पर हमारे देश के नेताओं का क्या रवैया है, यह जगजाहिर है। आर्थिक से लेकर सामाजिक दुश्वारियों के चलते सरकारें पूर्णबंदी से बचना चाहती हैं। पूर्णबंदी लगाए बिना भी सावधानी और बचाव के इंतजाम किए जा सकते हैं। आइपीएल जैसे गैरजरूरी आयोजनों को रोका जा सकता है। सामूहिक आयोजनों से लेकर दफ्तरों के कामकाज को नियमित और नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन इसके साथ ही चुनावी रैलियों और भीड़ पर भी रोक लगानी होगी, क्योंकि सबसे ज्यादा लापरवाही वहीं होती है और लोग सवाल उठाने लगे हैं कि अगर स्कूल-कॉलेज बंद हैं, सारी आर्थिक गतिविधियां बंद हैं तो चुनावी रैलियां क्यों हो रही हैं और वहां महामारी की क्या स्थिति है!
’बृजेश माथुर, बृज विहार, गाजियाबाद, उप्र

वक्त के दस्तावेज

सिनेमा समाज का दर्पण होता है। युवा वर्ग सिनेमा को अपने जीवन में उतारना चाहता है। सिनेमा समाज को एक नई दिशा प्रदान करता है। भारतीय फिल्म जगत में कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जिन्होंने समाज में एक संदेश और दिशा प्रदान करने का काम किया है। वर्ष 1982 में सुनील दत्त द्वारा बनाई गई फिल्म ‘दर्द का रिश्ता’ भी एक ऐसी फिल्म थी, जिसने कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से लड़ने के लिए समाज को प्रेरित किया।

इस फिल्म में कैंसर बीमारी से ठीक होने की कहानी दिखाई गई है। इसके प्रदर्शन के बाद कैंसर पर शोध बढ़ने लगा और आज कैंसर का सीमित ही सही, इलाज निकाला गया है। ऐसी फिल्में वक्त का दस्तावेज होती हैं। आज हमारा देश और समूचा विश्व कोरोना महामारी की त्रासदी से जूझ रहा है। अभी तक इसका कारगर इलाज नहीं निकल सका है। हो सकता है कि आने वाले समय में इस मसले पर नए शोध सामने आएं और ठोस इलाज भी निकले। यह भी संभव है कि इस समूचे प्रकरण को पर्दे पर भी उतारा जाए।
’हिमांशु शेखर, केसपा, गया, बिहार

विलुप्ति का खतरा

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित पोंग डैम में मरे विदेशी पक्षियों में बर्ड फ्लू का नया स्ट्रेन मिला है, जिसकी पुष्टि भोपाल की प्रयोगशाला रिपोर्ट द्वारा की गई। विदेशों से हर साल विदेशी पक्षी भारत की झीलों में आते हैं। संक्रमण से पक्षियों की मौत चिंतनीय पहलू है। पक्षियों में बर्ड फ्लू के नए स्ट्रेन को बढ़ने से रोकने के लिए कारगर कदम उठाना आवश्यक है, ताकि अन्य पक्षियों में संक्रमण न पहुंचे।

साथ ही विलुप्त प्रजातियों के पक्षियों के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं, उनकी चाल धीमी है। लुप्तप्राय प्रजातियों को नियंत्रित परिस्थितियों में संरक्षित रखने के लिए केवल नैसर्गिक स्थान और वातावरण विश्वसनीय समाधान है। दुर्लभ और मरणोन्मुख पक्षियों को सुरक्षित रखना और वंश वृद्धि की ओर ध्यान देने का लक्ष्य और कर्तव्य निश्चित करना होगा। साथ ही संरक्षित स्थानों को दूषित एवं संक्रमित वातावरण से दूर रखना होगा। अवैध शिकार करने वालों पर कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी होगी, ताकि पक्षियों में वृद्धि दिखाई दे और लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाया जा सके।
’संजय वर्मा ‘दृष्टि’, मनावर, धार, मप्र

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