जलवायु संकट

दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान पांच प्रतिशत है। अमेरिका और चीन में सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके बावजूद वे इसे नियंत्रित करने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वे न के बराबर है।

Chaupal
पृथ्वी को प्रदूषित करने में विकसित देशों का सबसे अधिक हाथ है।

दुनिया के तमाम देश जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहे हैं। प्राकृतिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग दुर्लभ होता जा रहा है और पेट्रोलियम तथा कोयले पर आधारित ऊर्जा का उपयोग बहुत बढ़ा है। स्वच्छ ऊर्जा स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा का उपयोग निश्चित रूप से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है। यहां धूप की कोई कमी नहीं है। विदेशों में कुछ दिनों और महीनों के लिए सूरज भी देखने को नहीं मिलता। उनकी तुलना में भारतीय लोग भाग्यशाली हैं। सौर ऊर्जा का उपयोग और कहां किया जा सकता है?

इसका उपयोग कैसे बढ़ेगा? इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। सौर ऊर्जा के उपयोग के लिए नागरिकों को भी आगे आना चाहिए। अगर भारत में इस ऊर्जा का उपयोग बढ़ता है, तो यह दुनिया के लिए एक बेहतरीन उदाहरण होगा। विकसित देशों को, जो भारत से कार्बन उत्सर्जन को कम करने की उम्मीद करते हैं, उन्हें इससे स्पष्ट जवाब मिलेगा।

दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान पांच प्रतिशत है। अमेरिका और चीन में सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके बावजूद वे इसे नियंत्रित करने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वे न के बराबर है। जिस तरह पृथ्वी को प्रदूषित करने में विकसित देशों की बड़ी भूमिका है, उसी तरह अंतरिक्ष को प्रदूषित करने में भी इनकी सबसे बड़ी भूमिका है।

केवल विज्ञान का ढोल बजाने से कोई फायदा नहीं है। वे विज्ञान के सहारे एक-दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं। इसके विपरीत, उन्हें भारत से सीखना चाहिए कि ऊर्जा की उच्चतम मांग के बावजूद शेष विश्व की तुलना में भारत के कार्बन उत्सर्जन में कम हिस्सेदारी के क्या कारण हैं?
’जयेश राणे, मुंबई

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