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बेमानी रिवायत

माहवारी कोई ऐसी बीमारी नहीं है कि इसमें किसी को न छूना, जमीन पर सोना या पूजा न करना जैसी पाबंदिया लगा दी जाती हैं।

Author Published on: November 22, 2017 5:32 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

कुछ समय पहले नेपाल की संसद ने एक प्राचीन हिंदू परंपरा ‘चौपदी’ को आपराधिक करार देने वाला एक कानून पारित किया, जिसमें माहवारी के दौरान और प्रसव के बाद महिलाओं को घर से बहिष्कृत कर दिया जाता है। इस परंपरा के तहत कुछ नेपाली समुदाय महिलाओं की माहवारी को अशुद्ध मानते हैं। इस प्रथा का पालन करने के लिए महिला पर दबाव बनाने वाले को तीन महीने की सजा या 3000 रुपए का जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। दरअसल, पुराने समय में सुरक्षित संसाधनों की या कहें कि सैनिटरी नैपकिन के अभाव के कारण स्वच्छता की दृष्टि से महिलाओं को घर के कुछ हिस्से से दूर रहने और आराम करने की सलाह दी जाती थी जो बाद में समाज में शोषणकारी कुरीति बन गई। हमारे देश में भी इस प्रथा के बारे में अलग-अलग धारणाएं मौजूद हैं। लेकिन कुछ जगहों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर जगहों पर यह महिलाओं के लिए प्रतिकूल ही है। माहवारी कोई ऐसी बीमारी नहीं है कि इसमें किसी को न छूना, जमीन पर सोना या पूजा न करना जैसी पाबंदिया लगा दी जाती हैं। आजकल सोशल मीडिया पर महिलाओं की बढ़ती सक्रियता के कारण ऐसे मामले खुल कर सामने आ रहे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि न केवल बड़े शहरों में, बल्कि छोटे शहरों-कस्बों में आज भी यह एक वर्जित विषय है।

एक समस्या यह भी है कि जो लोग इस प्रकार के व्यवहार को गलत मानते हैं, वे भी घरों में बड़े-बुजुर्गों की मौजूदगी या पारिवारिक ढांचे की वजह से इसे रोकने की बात नहीं कर पाते हैं। जापान, चीन, वियतनाम आदि कई देशों में महिलाओं को अपनी माहवारी के पहले दिन अवकाश यानी ‘पीरियड लीव’ देने का प्रावधान है। हमारे देश में बिहार में काफी पहले से सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं के लिए हर महीने दो दिनों के विशेष अवकाश की व्यवस्था है। अब निजी क्षेत्र में मुंबई की एक कंपनी ने भी इसकी शुरुआत की है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस कुरीति के विरुद्ध महिलाओं को जागरूक कर, उन्हें सच से अवगत करा कर, सैनिटरी नैपकिन बांट कर, स्वच्छता का महत्त्व बताया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत में अब भी केवल 57 प्रतिशत महिलाएं अपने मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित साधनों का उपयोग कर पाती हैं, जबकि लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन के उपयोग से ही अनभिज्ञ हैं। इसका परिणाम संक्रमण और सर्वाइकल कैंसर जैसी बीमारी के रूप में दिखता है जो लगभग 27 प्रतिशत महिलाओं की मौत का कारण बन रहा है। दूसरी ओर, एक मूलभूत आवश्यकता होने के बावजूद नैपकिन को 12-14 प्रतिशत जीएसटी के दायरे में रखना भी ग्रामीण महिलाओं तक इसकी पहुंच को कम करता है।
’निकिता राधा मंडलोई, इंदौर

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