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चौपाल- आतंकी जड़ें, बाजार का प्रेम, उनके बोल

अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, चीन जैसे कई देशों को वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुएं बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है।

Author Updated: February 14, 2017 7:23 AM
Representational Pic

आतंकी जड़ें
पिछले कुछ अरसे से रेल पटरियां को जिस तरह निशाने पर लिया जा रहा है वह गंभीर विषय है। हमारे देश में सबसे अधिक दूरगामी यातायात रेल मार्ग पर ही निर्भर है। गरीब से गरीब और अमीर से अमीर इंसान रेलगाड़ियों में सफर करता है। लेकिन रेल पटरियां उखाड़े जाने का मामला जिस तरह आइएसआइ से जुड़ रहा है वह बहुत गंभीर है। अगर वास्तव में आइएसआइ के इशारों पर रेल पटरियां उखाड़ी जा रही हैं तो इसका मतलब है कि आतंकी जड़ें कहीं न कहीं हमारे घरों में काफी मजबूत हो चुकी हैं जो हमारी खुफियां एजेंसियों की सोच से भी अधिक मात्रा में मौजूद हैं। ऐसे मामलों में राज्यों को अपने स्तर पर भी सुरक्षा इंतजाम पुख्ता रखने की जरूरत है।
’प्रदीप कुमार तिवारी, ग्रेटर नोएडा
बाजार का प्रेम
अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, चीन जैसे कई देशों को वेलेंटाइन डे के नाम पर अपनी वस्तुएं बेचने के लिए भारत जैसा देश एक सर्वश्रेष्ठ बाजार के रूप में नजर आता है। ग्रीटिंग कार्ड, टैडी बियर, चॉकलेट, तरह-तरह के गुलाब, उपहार आदि वस्तुएं बेच कर विदेशी कंपनियां भारी मात्रा में मुनाफा कमा रही हैं। इन सबसे अनजान रह कर युवा अपनी प्रेमिका के लिए ये सारी चीजें मुंहमांगे दामों पर खरीदता है। यदि ये सारी चीजें नहीं खरीदीं तो आपने वेलेंटाइन डे भी नहीं मनाया, ऐसा ये कंपनियां साफ तौर पर कहती हैं।
सवाल है कि क्या वेलेंटाइन डे मनाने के लिए वे सब चीजें होनी जरूरी हैं जिन्हें विदेशी कंपनियां मुनाफे की आड़ में हमें मूर्ख बना कर बेचती आ रही हैं। क्या इनके बगैर वेलेंटाइन डे मनाया तो संत वेलेंटाइन नाराज हो जाएंगे? और सबसे जरूरी बात यह है कि क्या हमें प्रेम का सलीका और उसका अर्थ यूरोप और पश्चिमी देशों से जानना पड़ेगा जो आज तक भोगवाद की बीमारी से ग्रस्त हैं और जहां का मूलमंत्र ही प्यार, सेक्स और धोखा है। दूसरी तरफ हमारी भारतीय संस्कृति का आधार प्रेम है।
हमारी संस्कृति प्रेम के मार्ग पर चल कर ही फलीभूत हुई है। जिस देश में सिर्फ सजीव नहीं, निर्जीव चीजों में भी प्रेम का भाव देखा जाता हो क्या उस देश के लोगों को प्रेम का ढाई अक्षर किसी यूरोप या उस जैसे किसी अन्य देश से सीखने की जरूरत है?
’देवेंद्रराज सुथार, बागरा, जालोर
उनके बोल

प्रियंका गांधी ने 2014 में भाजपा नेताओं को बौखलाए हुए चूहे पुकारा था। 2007 में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर बताया था। 2016 में राहुल गांधी ने उन्हें खून की दलाली करने वाला कहा। कांग्रेस के कई छोटे-बड़े नेता मोदी को तानाशाह, हिटलर, मुसोलिनी और गद्दाफी बता चुके हैं। इससे भी बहुत नीचे गिर कर वे उन्हें सांप, कुएं का मेंढक, यहां तक कि गंदी नाली का कीड़ा तक पुकार चुके हैं। मोदी या उनकी पार्टी ने इस गाली-गलौज के स्तर तक उतरी टिप्पणियों को ज्यादातर अनदेखा किया, कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पिछले दिनों लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने भाषण में तमाम उपलब्ध तथ्यों की अनदेखी कर कहा कि उनकी, यानी मोदी की तरफ का एक कुत्ता भी स्वतंत्रता आंदोलन में नहीं मरा
बहरहाल, एक ओर कांग्रेसियों की मोदी और भाजपा के लिए घृणा से लबरेज उपर्युक्त शब्दावली है, दूसरी ओर रेनकोट वाला एक व्यंग्य पूर्ण कटाक्ष, जिसमें घृणा या जुगुप्सा नहीं है। फिर भी कांग्रेसी तेवर दिखा रहे हैं। राहुल गांधी ने तो घोषित कर दिया कि मोदी को अपने से वरिष्ठ नेताओं के बारे में बोलने की तमीज ही नहीं है! हैरानी होती है इनकी समझ पर।
’अजय मित्तल, मेरठ

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