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टूटते सपने

नोटबंदी पर हो रही रस्साकशी के बीच अब सरकार की टीवी चैनलों के प्रति नाराजगी सामने आई है।
Author December 27, 2016 03:02 am
500 के नोट देकर 2000 के नए नोट लेती महिला। (PTI File Photo)

नोटबंदी पर हो रही रस्साकशी के बीच अब सरकार की टीवी चैनलों के प्रति नाराजगी सामने आई है। सरकार का मानना है कि टीवी चैनल नोटबंदी की नकारात्मक रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि नोटबंदी के चलते हुई लोगों की मौत, बेरोजगारी, व्यावसायिक घाटे आदि को दिखाना क्या नकारात्मक रिपोर्टिंग है? क्या सरकार के कामों की वाहवाही करना भर ही मीडिया का काम है? शायद नहीं। मीडिया को ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ इसलिए माना गया है ताकि वह लोगों के हितों की रक्षा कर सके। सामाजिक समस्याओं को सामने लाना भी मीडिया का ही काम है। अगर सचमुच वह ऐसा कर रहा है तो भला इससे सरकार को आपत्ति क्यों है? क्या सरकार मीडिया से आलोचना का अधिकार छीन लेना चाहती है?

दरअसल नोटबंदी के शुरुआती दिनों में सरकार ने लोगों को जो सपने दिखाए थे, वे अब टूटते हुए नजर आ रहे हैं। जिसे सरकार नकारात्मक रिपोर्टिंग का नाम दे रही है वह कुछ और नहीं, बल्कि सपनों की टूटन ही है। सरकार मीडिया को सकारात्मक रिपोर्टिंग का फरमान सुना लोगों की समस्याओं से ध्यान हटाना चाहती है। अगर ऐसा होता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक गहरा कुठाराघात होगा।
’कन्हैया जादौन, जामिया मिल्लिया, दिल्ली

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