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विचित्र मांग

विश्वविद्यालय के शोध छात्रों का वजीफा, यूजीसी जेआरएफ फेलोशिप और नॉन नेट फेलोशिप पिछले चार-पांच महीने से नहीं मिला है। क्या बेहतर नहीं होता कि सरकार के नुमाइंदों से टैंक मांगने के बजाय इन सारी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की मांग की जाती?

Author July 26, 2017 06:01 am
जेएनयू के वीसी जगदीश कुमार ( तिरंगा मार्च निकालते लोग।

विचित्र मांग
यह कितनी विचित्र बात है कि देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान जेएनयू के कुलपति सरकार से विद्यार्थियों के लिए पढ़ने-लिखने में सहायक आवश्यक सामान, बेहतर सुविधाएं मांगने के बजाय टैंक की मांग कर रहे हैं। यह सब तब किया जा रहा है जब विश्वविद्यालय में शिक्षकों के अभाव में, शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के नाम पर एमफिल, पीएचडी की लगभग एक हजार सीटें घटा कर सवा सौ कर दी गर्इं! दुखद यह है कि यह सब ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर किया जा रहा है! विश्वविद्यालय में सत्रारंभ हो रहा है। स्नातक और परास्नातक में आए नए विद्यार्थियों के समक्ष सबसे पहला संकट छात्रावास न मिलने का है। इसकी मुख्य वजह विश्वविद्यालय के पास पर्याप्त छात्रावास का न होना है। अगर रैंकिंग की तरफ नजर दौड़ाएं तो जेएनयू को देश का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय का प्रमाण हासिल है। यह जानकर हैरानी होगी कि जब पूरा देश आधुनिक तकनीक से डिजिटल हो रहा है, तब इस विश्वविद्यालय परिसर में वाई-फाई, इंटरनेट स्पीड का आलम दयनीय है! विश्वविद्यालय के शोध छात्रों का वजीफा, यूजीसी जेआरएफ फेलोशिप और नॉन नेट फेलोशिप पिछले चार-पांच महीने से नहीं मिला है। क्या बेहतर नहीं होता कि सरकार के नुमाइंदों से टैंक मांगने के बजाय इन सारी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की मांग की जाती?

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि जेएनयू जैसा शैक्षणिक संस्थान हमेशा से सत्ता के निशाने पर रहा है। राजनीतिक रूप से जागरूक इस विश्वविद्यालय ने सदैव आंख में आंख डाल कर सत्ता को अनुत्तरित कर देने वाले सवाल किए हैं। अपने देश में राजनीतिक सत्ताओं को हमेशा रट्टू तोतों की आवश्यकता रही है, जो उनके पिछलग्गू बने रहें। इस मामले में जेएनयू का चरित्र अन्य शैक्षणिक संस्थानों से थोड़ा भिन्न है। विचारधारा की लड़ाई विचार से लड़ी जानी चाहिए, बजाय तोप-टैंक और गोला बारूद के प्रतीकों से।
’बृजेश कुमार यादव, जेएनयू
खोने से पहले
आजकल प्रतिस्पर्धा के दौर में हर कोई हर किसी से आगे निकलना चाहता है। इस दौड़ में हर किसी को अपनी मंजिल जल्दी चाहिए। इस कारण जरूरत से ज्यादा चिंता होना लाजिमी है। ज्यादा चिंता तनाव को बढ़ाता है और तनाव के बढ़ने से इंसान अवसाद का शिकार हो जाता है। खुद को भीड़ में अकेला पाना, ज्यादा चिंता और तनाव लेना, अपने आप को हारा हुआ महसूस करना, किसी से बात को साझा नहीं कर पाना- ये सब अवसाद के ही लक्षण हैं। अवसाद से ग्रस्त इंसान अलग-थलग, चुपचाप और हर समय तनावग्रस्त नजर आता है। ऐसे में आसपास के लोगों को उसका ध्यान रखना चाहिए और उसकी मदद के लिए आगे आना चाहिए। मामूली अनदेखी या उसे हल्के से लेने की लापरवाही किसी व्यक्ति के भीतर के अवसाद को और गहरा कर दे सकती है। और हम सब जानते हैं कि अवसाद का मारा इंसान कब क्या कर ले, यह कोई नहीं जानता। इसलिए किसी को खोने से पहले जरूरी है उसे थाम लेना।
’शालिनी नेगी, जैतपुर, दिल्ली

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