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चौपाल: कड़ा संदेश

हुर्रियत के अलगाववादी नेता न तो कश्मीर के पूर्व राज परिवार से आते हैं और न वहां चुनाव लड़ कर जन-प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के नेता हैं।

Author September 8, 2016 2:08 AM
कश्मीरी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी (File Photo)

हुर्रियत के अलगाववादी नेता न तो कश्मीर के पूर्व राज परिवार से आते हैं और न वहां चुनाव लड़ कर जन-प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के नेता हैं। इसके बावजूद वे दशकों से कश्मीर समस्या के एक पक्ष के रूप में बने हुए हैं। तमाम सरकारें समस्या के हल के लिए इनकी चिरौरी करती रही हैं। सबको उनका एजेंडा पता है कि ये लोग कैसे पड़ोसी देश से पैसा लेकर कश्मीर के बेरोजगार नौजवानों को तो भड़काते हैं, उनसे पत्थर चलवाते हैं मगर अपने वारिसों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए तमाम तिकड़में-कोशिशें करते हैं। यही नहीं, जिस भारत के खिलाफ इनकी सोच खड़ी है वह तब सर के बल उलट जाती है जब हमें पता चलता है कि इसी देश में इन्होंने अपनी परिसंपत्तियां जुटाई हैं। कुल मिला कर ये ऐसे लोग हैं जो अपनी और अपने परिवार की उन्नति के लिए कश्मीर को दोजख के दरवाजे तक ले आए हैं।

बहरहाल, मोदी सरकार कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक नई रेखा खींच रही है। अलगाववादी नेताओं की सुख-सुविधाएं छीनने के साथ ही सरकार को इनके खिलाफ हर मोर्चे पर सख्त रवैया अख्तियार करना चाहिए। इस नाकेबंदी से न केवल इनका हौसला टूटेगा बल्कि पाकिस्तान को भी भारत के कड़े हुए रुख का कड़ा संदेश जाएगा। दूसरी ओर, कश्मीरी अवाम के लिए भी इस बात को समझने का मौका है कि ऐसे तत्त्व कभी उनके सगे नहीं हो सकते जो कश्मीर को तंदूर में झोंक कर अपनी रोटियां पकाते हैं।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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