बस्ते का बोझ

तेलंगाना सरकार ने बच्चों के हित में एक बहुत महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया है और वह है उनके बस्ते का बोझ कम करने का। इसके साथ ही उसने प्राथमिक स्तर तक के विद्यार्थियों के होमवर्क पर भी रोक लगा दी है।

रिक्शा चलाते गरीब बच्चें।

बस्ते का बोझ
हाल ही में तेलंगाना सरकार ने बच्चों के हित में एक बहुत महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया है और वह है उनके बस्ते का बोझ कम करने का। इसके साथ ही उसने प्राथमिक स्तर तक के विद्यार्थियों के होमवर्क पर भी रोक लगा दी है। विडंबना है कि इन दिनों दो से ढाई वर्ष की उम्र में ही बच्चे स्कूल जाने लगे हैं क्योंकि विद्यालयों की व्यवस्था बदल गई है और पहली क्लास में आने से पहले उन्हें तीन क्लास पास करनी पड़ती हैं। छोटे-छोटे बच्चों को सिखाने के नाम पर ढेर सारी किताबें दे दी जाती हैं। बहुत कम उम्र उम्र में ही उन पर पढ़ाई का इतना सारा बोझ डाल दिया जाता है कि वह बोझ उनके बस्तों में दिखाई देता है।

न्यायालय का भी निर्णय स्पष्ट है कि बच्चे के वजन का दस प्रतिशत से ज्यादा वजन बस्ते का नहीं होना चाहिए मगर वास्तविकता इससे अलग ही है। सवाल है कि हम क्यों बच्चों का मशीनीकरण करने में लगे हैं? निजी स्कूल अपनी फीस बढ़ाने के चक्कर में मोटी-मोटी किताबें बच्चों पर लाद देते हैं। उधर अभिभावकों की भी यह मानसिकता रहती है कि बच्चे जितना पढ़ेंगे उतना होशियार बनेंगे। निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए अब सरकार को आगे आना होगा। बच्चों का स्वास्थ्य पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि तुरंत प्रभाव से यह निर्णय पूरे भारत में लागू करे। आज के समय में दृश्य-श्रव्य तकनीक के माध्यम से भी बच्चों को सिखाया जा सकता है। उम्मीद है, आने वाले समय में केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारें भी इस मामले में कड़े कदम उठाएंगी।
’शिल्पा जैन सुराणा, वारंगल, तेलंगाना
जागृति की जरूरत
आजादी के सात दशक बाद भी हिंदुस्तान ‘विकसित इंडिया’ और ‘पिछड़े भारत’ में बंटा हुआ है। एक ओर भारत अंतरिक्ष और तकनीक में पूरी दुनिया में लोहा मनवा रहा है तो दूसरी तरफ पिछड़े भारत में डायन, नरबलि, भूत प्रेत, जादू टोना जैसे अंधविश्वासों का बोलबाला है। एक सर्वे के मुताबिक 72 फीसद ग्रामीण आज भी आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के बजाय तांत्रिकों पर अधिक विश्वास करते हैं। तथाकथित तंत्रविद्या की सिद्धि के लिए मासूम बच्चों की बलि देने की घटनाएं हों या फिर डायन कह कर महिलाओं को प्रताड़ित करने की घटना हो, ये हमारे डिजिटल युग में पहुंचने के दावों के कलई खोलती हैं। ऐसे में हम भारतीयों में वैज्ञानिक चेतना की दुहाई दें या फिर विकास दर में लंबी छलांग लगाने का दंभ भरें, बेमानी ही होगा।

समाज में व्याप्त इन्हीं अंधविश्वास और कुरीतियों को दूर करने के लिए वैज्ञानिक सोच के साथ जन-जागृति की जरूरत है। जन-जागृति के लिए विभिन्न नुक्कड़-नाटकों, समारोहों तथा सम्मेलनों का आयोजन ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाना चाहिए। साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं व समूहों को आगे आना होगा ताकि भारतीय संविधान में जो वैज्ञानिक मनोवृत्ति के विकास की बात कही गई हैं, वह हर भारतीय के चेतन मन का हिस्सा बन सके।े
’कैलाश मांजू बिश्नोई, मुखर्जीनगर, दिल्ली

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