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दोषी कौन

क्या शिक्षा संस्थानों की ऐसी दुर्गति के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में पढ़ाने को न केवल अपनी प्रतिष्ठा का सूचक मानते हैं, बल्कि इन स्कूलों की मनमानी फीस भी जमा करते हैं।

Author Published on: October 3, 2017 5:47 AM
रेयान इंटरनेशनल स्कूल।

नारे से आगे
आजकल हर मंच पर हिंदी को आगे बढ़ाने और उसका प्रचार-प्रसार करने पर जोर दिया जा रहा है। राष्ट्रवाद का नारा भी इन दिनों बहुत मुखर है। लेकिन इस सबके बीच तेईस सितंबर यानी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के जन्मदिन को बहुत कम लोगों ने याद किया। जबकि दिनकर की कविताएं देशप्रेम से लेकर मानव संसार की भिन्न भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं और उन कविताओं का संदर्भ के साथ प्रयोग भी होता रहा है। उन्हें संतोषजनक रूप से याद नहीं किया जाना अफसोसनाक है। दरअसल, भावनाओं से जुड़े मुद्दे जब राजनीतिक स्वार्थ साधने का जरिया बन जाते हैं, तो उसमें ऐसे ही दोहरेपन का विकास होता है।
तनुजा दत्ता, गाजियाबाद

दोषी कौन
आजकल स्कूलों की अव्यवस्थाओं और विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर हर तरफ चिंता व्यक्त की जा रही है। स्कूलों में बच्चों की प्रताड़ना, शोषण से लेकर हत्या तक के मामले सामने आ रहे हैं। क्या यह सब अचानक होने लगा? आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी? क्या शिक्षा संस्थानों की ऐसी दुर्गति के लिए अभिभावक भी जिम्मेदार नहीं हैं, जो अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में पढ़ाने को न केवल अपनी प्रतिष्ठा का सूचक मानते हैं, बल्कि इन स्कूलों की मनमानी फीस भी जमा करते हैं। इस तरह की मानसिकता वाले समाज में जहां शिक्षा से ज्यादा शिक्षा का दिखावा महत्त्वपूर्ण हो, वहां ऐसी घटनाएं आश्चर्यजनक नहीं हैं।
आज तमाम अभिभावक जिन निजी स्कूलों को सरकारी नियंत्रण में लेने की मांग कर रहे हैं, उन्होंने ही भारी मेहनत कर ऊंची फीस भर कर अपने बच्चों का दाखिला इन स्कूलों में इसलिए कराया था कि ये सरकारी नहीं थे। हमारे समाज में आडंबर और प्रदर्शन की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है। बच्चों पर मित्र समूह, समाज, स्कूल और अभिभावकों का दबाव बढ़ा है। ऐसी स्थिति में केवल स्कूलों को दोषी ठहरा कर यदि तात्कालिक उपाय किए गए तो वे कोई सार्थक परिणाम नहीं दे पाएंगे।
’मधुर मोहन मिश्र, अनंतपुर, रीवा

अक्षय ऊर्जा
पिछले दिनों सरकार ने एक पर्यावरण हितैषी योजना की घोषणा करते हुए जानकारी दी कि 2022 तक भारत में धरती के गर्भ में मौजूद ऊष्मा से बिजली उत्पादन शुरू हो जाएगा और सालाना 830 करोड़ यूनिट बिजली पैदा की जा सकेगी। निस्संदेह इस तरह बिजली उत्पादन करने से पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा। पृथ्वी के करीब तीन-चार किलोमीटर अंदर मौजूद गर्म चट्टानों से बिजली पैदा की जाएगी। यह बिजली जियोथर्मल प्लांट से सप्लाई की जाएगी। इसकी खूबी है कि यह कभी खत्म नहीं होगी और हमें अक्षय ऊर्जा मिलती रहेगी।
’संजय डागा हातोद, इंदौर, मध्यप्रदेश

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