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दर्द का बांध

सरदार सरोवर बांध को उसकी अधिकतम क्षमता तक भरने के लिए मध्यप्रदेश स्थित इंदिरा सागर बांध के तीस दरवाजे खोलने से जो जल सैलाब आएगा उससे मध्यप्रदेश के 244 गांव डूब रहे हैं, जिनमें रहने वाले लगभग चालीस हजार परिवारों को बेघर होना पड़ रहा है।

Author September 19, 2017 5:51 AM
प्रधानमंत्री का कहना था कि उन्‍होंने अपने कुर्ते की बांहें इसलिए काट दी थीं ताकि उन्‍हें असुविधा न हो। उनके अनुसार, इससे कुर्ता धोना और उसे प्रेस करना आसान हो जाता है। मोदी के अनुसार उन्‍होंने रोज इस तरह दो मिनट बचा-बचाकर अपनी खातिर अच्‍छा-खासा समय बचा लिया है। (Source: Express Archive)

दर्द का बांध

सत्रह सितंबर ’17 को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री ने महत्त्वाकांक्षी ‘सरदार सरोवर बांध’ राष्ट्र को समर्पित कर दिया है। हमारा सरदार सरोवर परियोजना से उस सीमा तक कोई विरोध नहीं है, जहां तक वह देश के समुचित विकास और पेयजल, सिंचाई और विद्युत परियोजनाओं के हित में भागीदारी निभाएगी। लेकिन जो जानकारी सामने आई है उसके अनुसार इस परियोजना का अधिकतम उपयोग कोकाकोला, टाटा आॅटोमोबाइल, बुलेट ट्रेन और औद्योगिक गलियारे के निर्माण में होगा। अनुबंध के अनुसार कोकाकोला कंपनी को तीस लाख लीटर और टाटा इंडस्ट्रीज को साठ लाख लीटर पानी रोज दिया जाएगा।
दूसरी ओर, सरदार सरोवर बांध को उसकी अधिकतम क्षमता तक भरने के लिए मध्यप्रदेश स्थित इंदिरा सागर बांध के तीस दरवाजे खोलने से जो जल सैलाब आएगा उससे मध्यप्रदेश के 244 गांव डूब रहे हैं, जिनमें रहने वाले लगभग चालीस हजार परिवारों को बेघर होना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुसार डूब क्षेत्र के हजारों लोगों का उचित और न्यायसंगत पुनर्वास नहीं किया है। इसके विरोध में राज्य के निमाड़ क्षेत्र (बड़वानी, खरगोन, खंडवा) तथा धार, अलीराजपुर आदि आदिवासी अंचल में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेता मेधा पाटकर के नेतृत्व में हजारों किसान और आदिवासी आंदोलनरत हैं।

जिला बड़वानी, तहसील अंजड़ के ग्राम छोटा बड़दा में मेधाजी सहित 37 सत्याग्रही ‘जल सत्याग्रह’ कर रहे हैं। इस जल सत्याग्रह के कारण सत्याग्रहियों की त्वचा खराब होने लगी है। यदि प्रधानमंत्री ने मध्यप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री को निर्देश दिए होते कि सुप्रीम कोर्ट की दी गई समयावधि में सभी विस्थापितों का दिशा निर्देशों के अनुसार उचित और न्यायसंगत पुनर्वास किया जाए तथा मध्यप्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार कार्रवाई की होती तो हजारों लोग इस तरह बेघर होने के लिए अभिशप्त नहीं होते। यदि इन गरीब और पीड़ित विस्थापितों के दर्द को केंद्र और राज्य सरकारें महसूस करतीं, जिन्होंने राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी, तो उनका उचित और न्यायसंगत पुनर्वास हो जाता और वे भी प्रधानमंत्री को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं देते।
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

महंगा पेट्रोल
इन दिनों देश में पेट्रोल के दाम बेतहाशा बढ़ते हुए अस्सी रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गए हैं। महंगाई पर काबू पाने की तमाम कोशिशें करने के दावों के बीच महंगाई बढ़ाने के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बेलगाम वृद्धि एक विडंबना से कम नहीं है। इस तरह एकाएक पेट्रोल के दाम बढ़ना समझ से परे है, क्योंकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार कम हो रही हैं। ये कीमतें करीब 52 फीसद तक घटने के बावजूद भारत में पेट्रोल सस्ता नहीं हो पा रहा है।
सरकार ने भी पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क, जो कभी दस रुपए लीटर था, बढ़ाकर बाईस रुपए प्रति लीटर कर दिया। यदि वह उत्पाद शुल्क कम कर दे तो जनता को पेट्रोल के दामों में बड़ी राहत मिल सकेगी।
’संजय डागा, देवी अहिल्या कॉलोनी, हातोद

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