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ईमानदारी का जोखिम

कुछ हिंदुओं को लगता है कि सारे मुसलमान आतंकवादी और गोहत्या करने वाले हैं।

Author Published on: May 24, 2017 5:57 AM
लेडी गैंगलीडर ने चाकुओं से गोदकर की हत्या। (प्रतीकात्मक फोटो)

सन 2007 बैच के एक कर्मठ आइएएस अफसर अनुराग तिवारी जहां भी गए, अपनी एक छाप छोड़ के गए जनता के दिल में। निर्भीक, निडर और मिलनसार अनुराग जनता की समस्याओं को अपनी दिक्कत समझ कर उनका त्वरित निवारण करते थे। हाल ही में वे अपने जन्मदिन की तारीख पर ही सड़क किनारे संदिग्ध अवस्था में मृत पाए गए। उनके शरीर पर गहरी चोट के निशान थे। साफ है कि उनकी ईमानदारी और निर्भीकता कुछ लोगों की आंखों की किरकिरी बन रही थी। यह पहला मौका नहीं है, जब इस देश में ईमानदार अफसरों को अपनी ईमानदारी का ऐसा सिला मिला है। आइएएस डीके रविकुमार की खुदकुशी का मामला काफी चर्चित रहा था। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि उन्होंने खुदखुशी की थी। कर्नाटक के कोलार जिले में तैनात रवि ने भूमाफिया की नींद हराम कर रखी थी। साधारण लोग उनसे इतने प्रभावित थे कि जब भी उनका तबादला हुआ तो आम लोगों ने उसका पुरजोर विरोध किया।
इसी तरह, एस मंजुनाथ एक होनहार छात्र के रूप में हमेशा लोकप्रिय रहे।

उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का लाखों का प्रस्ताव छोड़ा और अपने देश के लिए कुछ करने का निर्णय लिया था। इसी वजह से परेशान पेट्रोल माफिया ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। सत्येंद्र दुबे ने नेशनल हाइवे परियोजना में चल रहे बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया तो उनकी भी हत्या कर दी गई। 2011 में तेल माफिया ने मालेगांव में जिला समाहर्ता यशवंत सोनवणे को जिंदा जला दिया, क्योंकि वे उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा थे। आइपीएस नरेंद्र कुमार और न जाने कितने लोग है, जिन्होंने ईमानदारी की वजह से अपनी जान गवांई। वे जानते थे कि जिस राह पर वे चल रहे हैं, उस पर उनकी जान भी जा सकती है। फिर भी वे डटे रहे अपने फर्ज के लिए।

कब तक ऐसा चलता रहेगा? कब तक हमारे ईमानदार अफसर इसकी कीमत चुकाते रहेंगे? अब आम जनता को जवाब मांगना पड़ेगा। क्या भविष्य होगा हमारे देश का, जब सच बोलने से लोग कतराएंगे? जब हमारे बच्चे ये सवाल करेंगे कि इस देश में ईमानदार रहने का नतीजा क्या है तो हम क्या बताएंगे? ये हमारे देश के भविष्य का सवाल है।
’शिल्पा जैन सुराणा, वरंगल, तेलंगाना

जड़ चेतना

अफवाह के आधार पर भीड़ द्वारा लोगों की हत्या की घटनाएं लंबे समय से चलती आ रही है। पूरा का पूरा समाज पूर्वग्रह से ग्रस्त है। बच्चा चोरी की कोई घटना हुए बिना भी कुछ लोगों को लगने लगता है कि बाहरी लोग उनके बच्चे को चोरी करके ले जाते हैं। कुछ हिंदुओं को लगता है कि सारे मुसलमान आतंकवादी और गोहत्या करने वाले हैं। पूर्व के राज्यों के लोगों को लगता है कि सरकारी नौकरी करने वाले दहेज के लोभी होते हैं। लोगों के इसी पूर्वग्रह और अफवाहों के बाजार गरम रहने का नतीजा झारखंड में सात लोगों की भीड़ द्वारा हत्या जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है। यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें भीड़ ने इस तरह अपना विवेक खो दिया और महज किसी अफवाह के आधार पर किसी बेकसूर की पीट-पीट कर जान ले ली। झारखंड में कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें ‘डायन’ होने का आरोप लगा कर किसी बुजुर्ग और कमजोर महिला को सरेआम मारपीट कर मार डाला गया।

यह मान लिया जा सकता है कि ग्रामीण और पिछड़े समुदायों के लोग कम पढ़े-लिखे और कम जागरूक हैं। लेकिन उन प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के बारे में क्या कहा जाए, जो तार्किकता और बौद्धिकता की कठिन परीक्षा पास कर अपने पद पर आसीन होते हैं। क्या उनका कार्य उनके क्षेत्र में उन अफवाहों का शमन करना और लोगों की भ्रांतियों को निराकरण करना और जागरूकता पैदा करना नहीं है? अगर उनके द्वारा वक्त रहते सजग प्रयास किया जाता तो कई निर्दोषों की जान नहीं जाती।
’कुंदन कुमार, अहमदाबाद

 

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