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सच पर परदा

पिछले हजार साल की गुलामी को छोड़ दिया जाए तो भी आजादी के बाद हजारों ऐसे मौके आए हैं जब हमने दंगों-कत्लेआम की कड़वी हकीकत न तो सामने आने दी और न ही उन्हें याद करने लायक कुछ छोड़ा।
Author August 10, 2017 05:42 am
2002 गुजरात दंगे की फाइल फोटो (Express archive)

सच पर परदा

तवलीन सिंह ने ‘भुलाने की कोशिश में दर्द बढ़ता गया’ (वक्त की नब्ज, 6 अगस्त) में आम इंसान के दरिंदे बनने के कारण जानने की जो कोशिश की वह अंत में एकांगी बन गई। लेखिका यह तो बताती हैं कि जहां जर्मनी में हर पल याद दिलाया जाता है कि हिटलर ने कैसे यहूदियों का दमन किया वहीं भारत में दंगे-कत्लेआम को भुलाने की कोशिश की जाती है लेकिन वे इसकी वजह जानबूझ कर नहीं बतातीं। देखा जाए तो भारत में सच को छिपाने और उससे सबक न सीखने की लंबी पंरपरा रही है। पिछले हजार साल की गुलामी को छोड़ दिया जाए तो भी आजादी के बाद हजारों ऐसे मौके आए हैं जब हमने दंगों-कत्लेआम की कड़वी हकीकत न तो सामने आने दी और न ही उन्हें याद करने लायक कुछ छोड़ा।
विभाजन के दौरान मानव इतिहास का भीषणतम कत्लेआम हुआ लेकिन इतिहास की किताबों में यही पढ़ाया जाता है कि बंटवारा या सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया। 1948 में हैदराबाद में रजाकरों की इस्लामी सेना ने बड़े पैमाने पर हिंदू महिलाओं से बलात्कार जैसा गुनाह किया लेकिन इस सच को देश के सामने जानबूझ कर नहीं आने दिया गया क्योंकि इसमें सत्ताधारियों के स्वार्थ छिपे थे।

1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बंगाली हिंदुओं का जो सामूहिक नरसंहार किया गया उसकी मिसाल इतिहास में शायद ही मिले। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि तत्कालीन प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) ने इस नरसंहार को ब्लैक आउट करा दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि यदि हिंदुओं के कत्लेआम की खबर मीडिया में आ गई तो जनसंघ (अब भाजपा) इसका राजनीतिक फायदा उठा लेगा। भारतीयों को इस नरंसहार की खबर महीनों बाद विदेशी मीडिया के जरिए मिली थी। कमोबेश यही हालत अमदाबाद, मुरादाबाद, भागलपुर, दिल्ली व मुंबई के दंगों के साथ हुई। यही कारण है कि जर्मनी के विपरीत भारत में धार्मिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। हिंदुत्ववादी हिंसा को लेखिका ने मुसलिम हमलावरों के ऐतिहासिक अत्याचार से जोड़कर लेख का गुड़ गोबर कर दिया। सच्चाई यह है कि हिंदुत्ववादी हिंसा की जड़ कांग्रेस की मुसलिमपरस्ती की प्रतिक्रिया में है। ‘संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का’ इस वक्तव्य के क्या निहितार्थ हैं, इसे समझ लेतीं तो वे हिंदुत्ववादी हिंसा को समझने में भूल न करतीं। हिंदुत्ववादी हिंसा दरअसल इस्लामी एकाधिकारवाद के बढ़ते वर्चस्व और उसकी प्रतिक्रिया में उपजी असुरक्षा की भावना की देन है और यही असुरक्षा की भावना भारतीय जनता पार्टी को उर्वर जमीन मुहैया करा रही है। दुर्भाग्यवश देश के अधिकांश लेखकों की सोच कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता से आगे नहीं बढ़ पाती है। यही कारण है कि धार्मिक कट्टरता कम होने का नाम नहीं ले रही है।
’रमेश कुमार दुबे, मोहन गार्डन, दिल्ली
कैसी सोच
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर कहते हैं कि पुत्र की गलती की सजा पिता को क्यों मिले! इसीलिए वे अपराध आरोपी विकास बराला के पिता को क्लीन चिट देते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा मुलायम सिंह ने कहा था कि लड़के गलती कर ही जाते हैं! मुख्यमंत्रीजी, कहावत है कि ‘बाढ़े पूत पिता के धर्मा’। अर्थात पुत्र का विकास पिता के धर्म से होता है यानी पुत्र अपनेमाता-पिता के संस्कारों का सर्टिफिकेट जैसा होता है। नैतिकता का तकाजा है कि अपनी सोच के लिए मुख्यमंत्रीजी को भी प्रायश्चित करना चाहिए।
’त्रिलोकीनाथ गर्ग, शहडोल, मध्यप्रदेश

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