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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को जितनी शानदार सफलता मिली, उतनी ही पंजाब में कांग्रेस को भी मिली।

Author March 15, 2017 5:40 AM
लोकसभा में पीएम मोदी। (फाइल फोटो)

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा को जितनी शानदार सफलता मिली, उतनी ही पंजाब में कांग्रेस को भी मिली। दो राज्यों में किसी को बहुमत नहीं मिला। गोवा, जहां भाजपा का शासन था, वहां न केवल उसका मुख्यमंत्री हार गया बल्कि चालीस में से उसे केवल तेरह सीटें मिलीं जबकि कांग्रेस को सत्रह सीटें मिलीं। मणिपुर में, जहां कांग्रेस लगातार तीन बार से सत्ता में थी, बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई और उसे अट्ठाईस सीटें मिलीं जबकि भाजपा को 21 मिलीं।  उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली सफलता पर कॉरपोरेट मीडिया ने मोदी के अपराजेय होने के जबरदस्त ढोल बजाए जबकि इन्हीं मोदी के रहते पंजाब अकाली-भाजपा गठबंधन के हाथ से निकला और गोवा व मणिपुर में वह बहुमत से बहुत दूर रही। बावजूद इसके चर्चा नाकामियों पर नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की विजय पर टिकी रही। कांग्रेस मुक्त भारत का दावा करती भाजपा का धीरे-धीरे कांग्रेसीकरण ही सामने आ रहा है। अपनी साफ छवि दिखाने के लिए चाल, चरित्र और चेहरे का उसका नारा कहीं पहचान नहीं बना पाया बल्कि हर राज्य में सरकार बनाने के लोभ में उसका पूरी तरह कांगे्रसीकरण हो गया है।

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हम देख रहे हैं कि जहां-जहां चुनाव होने होते हैं, वहां चुनाव से पहले कांग्रेस या दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को टिकट देकर पहले भाजपा में मिला लिया जाता है और जहां कहीं चुनाव-बाद बहुमत से दूर रह जाने की स्थिति बनती है तो वहां दूसरे दलों को, जो उसके खिलाफ चुनाव लड़े थे, शामिल कर लिया जाता है। हालांकि दूसरे दलों से लोगों को तोड़ कर लाने का सिलसिला पिछले लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनने के बाद से ही शुरू हो गया था, जो उसके बाद हुए हर विधानसभा चुनावों में जारी है। बिहार में लोकसभा चुनावों के दौरान तो वे सफल रहे लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली मगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में वे लोकसभा चुनाव में भी सफल रहे और अब विधानसभा में भी ऐसा करने में कामयाब हो गए। असम में वे कांग्रेस से लाकर सर्वानंद को मुख्यमंत्री बना चुके हैं। अरुणाचल में भी उन्होंने इसे फिर दोहराया। अब मणिपुर में भी उन्होंने ऐसा प्रयास किया है और विधायक दल का नेता पूर्व कांग्रेसी ही चुना है। आगे कर्नाटक के लिए भी उन्होंने तैयारी शुरू कर दी है और कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को लाने की तैयारी में है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद के लिए प्रतिस्पर्धा में खड़े कई पूर्व कांगे्रसियों को हम देख ही रहे हैं। उत्तर प्रदेश में सफलता के बाद अब मोदी और उनकी भक्तमंडली नोटबंदी को ही नहीं, लोकतंत्र का गला घोंटने की लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाई को ‘कांग्रेस भी यही करती थी’, जैसे तर्क की आड़ में सही ठहराने पर तुली है। उत्तर प्रदेश की विजय के शोर में गोवा और मणिपुर में, जहां बहुमत नहीं मिला, वहां भी भाजपा अपनी सरकार बनाने की अनैतिकता दिखा रही है।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में महज सपा और कांग्रेस के मिलने से समीकरण बदलने वाला नहीं था, यदि इसमें बसपा भी जुड़ती तभी बदलाव होता जैसा कि बिहार में कांग्रेस, राजद और जद (एकी) के मिलने से बदला था। गैर जाटव और गैर यादव के साथ हिंदू सांप्रदायिकीकरण के तमाम खेल के बावजूद भाजपा का लोकसभा 2014 के समय का प्राप्त मत 43 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत पर आया। बसपा का भी एक प्रतिशत से घटा लेकिन मिलकर लड़ीं सपा और कांग्रेस का मत प्रतिशत एक प्रतिशत से बढ़ा फिर भी वे बीच के भारी अंतर को नहीं पाट सके। बहरहाल, ‘विजय के सौ बाप होते हैं’ की तरह अब भाजपा नोटबंदी और चौतरफा नाकामियों को छुपाकर अपनी कथित उपलब्धि और योजनाओं के चाहे जितने बखान करे मगर कांग्रेस से न उसकी नीतियां अलग हैं और न उसका चाल, चरित्र और चेहरा। न व्यवस्था बदली, न समाज की हालत। भाजपा का कांग्रेसीकरण ही यथार्थ है। उत्तर प्रदेश की विजय पूरे देश की जनता का रुझान तय नहीं करती। वक्त आने पर इसका जवाब भी मिल जाएगा।
’रामचंद्र शर्मा, तरुछाया नगर, जयपुर

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