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पता होना चाहिए कि धर्मगुरु को क्या करना चाहिए और क्या नहीं

धर्म इस देश का सबसे संवेदनशील मसला है। इससे जुड़ी हर चीज संवेदनशील है, यानी इसे मानने वाले, इसके मसले और मुखिया भी।

Author May 22, 2017 6:18 AM
कोलकाता की टीपू सुल्‍तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्‍मद नुरुर रहमान बरकती ।

वादों का क्या

आमजन की बड़ी उम्मीदों के बीच भाजपा के अनिल बलूनी ने नरेंद्र मोदी के कार्यों की इस प्रकार विवेचना की है, मानो उन्होंने देश के नागरिकों को वे सब चीजें या सुविधाएं दी हैं, जो और कोई नहीं दे सकता। बलूनी जी को याद रखना चाहिए कि मोदी ने चुनाव के समय क्या-क्या वादे किए थे। मोदी ने भ्रष्टाचार हटाने का वादा भी चुनाव के पहले कई मंचों से किया था, पर जिस प्रकार लोकपाल विधेयक को उनकी सरकार ने लटका रखा है उससे ऐसा लगता है कि उसकी भ्रष्टाचार मिटाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। चुनावी चंदे के बांड वाली योजना से तो लगता है कि वह भ्रष्टाचार को कानूनी जामा पहनाना चाहती है। फिर कांग्रेस और मोदी की भाजपा में क्या अंतर है? बलूनी के इस लेख से अलग, संगठित भ्रष्टाचार से आमजन बहुत दुखी हैं, पर विकल्पहीनता के कारण भाजपा को जिताना जनता की मजबूरी है।
’राम अवतार गुप्ता, नया गांधी चौक, शहडोल्र

ये धर्मगुरु
धर्म इस देश का सबसे संवेदनशील मसला है। इससे जुड़ी हर चीज संवेदनशील है, यानी इसे मानने वाले, इसके मसले और मुखिया भी। इसके मुखिया वे लोग हैं, जो इसके बड़ा होने का दावा करते हैं और सबसे ज्यादा दिक्कत इन्हीं से शुरू होती है, क्योंकि मीडिया के सामने झट से बोलने वाले और कुछ भी बोलने वाले यही लोग होते हैं। ये बोल कर चले जाते हैं और नया बखेड़ा खड़ा कर देते हैं या इनका किया काम ‘धर्म’ की पहचान बन जाता है।
ऐसे लोगों की फेहरिस्त में स्वामी ओम; मौलाना बरकती- जो टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम थे, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रवक्ता की तरह बातें करते थे और बाबा राम रहीम सिंह इंसा, जिनके साथ विवाद जुड़े ही रहते हैं, जैसे लोग आते हैं। मगर इनमें से कोई भी व्यक्ति शायद अपने धर्म को नहीं जानता, क्योंकि अगर जान रहे होते तो ऐसा कार्य नहीं करते। इन्हें पता होना चाहिए कि धर्मगुरु को क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
’असद शेख, दिल्ली विश्वविद्यालय

 

मजाक बनते गरीब
यह एक कटु सत्य है कि मौजूदा दौर में बाजार और विचार की आपाधापी के बीच बाजार अपने पूरे कौशल के साथ सब पर हावी है। मुंबइया फिल्मों के सितारे सबको खाना-पीना और रहना-सहना सिखा रहे हैं। साथ ही होली, दीवाली, राखी आदि त्योहार कैसे मनाएं, ये सभी चमचम करते टीवी सीरियल दिखा रहे हैं। सब राजनीतिक दल नारों की हंडिया में वादों की खिचड़ी पका कर अपनी प्यारी और भूखी-प्यासी गरीब जनता को खिलाने पर आमादा हैं। निस्संदेह वैश्वीकरण और उदारीकरण की आंधी में गरीब मजदूर, किसान, दस्तकार, शिल्पकार, दस्तकार आदि वर्ग भूखों मरने पर मजबूर हंै। एक ओर राजधानी में अपने वातानुकूलित कमरों में बैठे हमारे रहनुमा अपने भाषाणों को आकर्षक बनाने में मशगूल हैं, तो दूसरी और राजधानी के जंतर मंतर पर हमारे अन्नदाता अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शायद हमारे रहनुमा होरी-हल्कू की नियति को ही गरीब किसानों की नियति मान चुके हैं। यही कारण है कि टीवी चैनलों पर झलक दिखला जा, आ जा नच ले, कॉमेडी सर्कस आदि जैसे कार्यक्रमों के पैरों तले हमारे अन्नदाताओं की मौत की खबरें केवल एक टिकर बन कर रह जाती हैं।
’रमेश शर्मा, केशव पुरम, दिल्ली

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