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मुसलमान रामभूमि बाबरी मस्जिद के विवाद को खत्म कर नई इबादत लिखने को तैयार

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद को मुसलिम धर्मगुरुओं ने खत्म करने और बाबर के आक्रांता होने को स्वीकार करके राम मंदिर निर्माण में सहयोग करने के लिए समाज ने एकता का संदेश दिया है, उससे कौमी एकता और अखंडता मजबूत होगी।

Author May 22, 2017 6:24 AM
अयोध्या का एक राम मंदिर (Photo: PTI)

मंदिर और मुसलमान

बीते जमाने में हिंदू-मुसलिम आमने-सामने होते थे, लेकिन नए जमाने की हवा में सांप्रदायिकता के विष को युवा अमृत तुल्य बनाने का काम कर रहे हैं। सोच के बदलाव के कारण ही तो मुसलमान रामभूमि बाबरी मस्जिद के विवाद को खत्म कर नई इबादत लिखने को तैयार हैं। मंदिर निर्माण को तूल देने के बजाय सद्भाव का नारा बुलंद करने के लिए आगे आए समाज के गणमान्य नागरिकों और समाज में अपनी अहम भूमिका अदा करने वालों का स्वागत है। राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद को मुसलिम धर्मगुरुओं ने खत्म करने और बाबर के आक्रांता होने को स्वीकार करके राम मंदिर निर्माण में सहयोग करने के लिए समाज ने एकता का संदेश दिया है, उससे कौमी एकता और अखंडता मजबूत होगी। मुसलिम और हिंदू समाज में आपसी भाईचारा बढ़ेगा।

एक समाचार के मुताबिक मुहम्मद अनीस उर्फ बल्लू खान, लखनऊ निवासी आजम खान, दिल्ली के उद्योगपति कैप्टन सिकंदर रिजवी और अयोध्या के जामा मस्जिद ट्रस्ट के अध्यक्ष तनवीर रिजवी ऐसे नाम हैं, जो राम मंदिर निर्माण में पूर्ण सहयोग देने के लिए तत्पर हैं। आल इंडिया शिया पॉलिटिकल कान्फें्रस के राष्टÑीय अध्यक्ष अल्लामा सैयद असगर अब्बास भी राम मंदिर बनाने के पक्ष में हैं। कैप्टन रिजवी ने राम मंदिर निर्माण का सर्मथन किया है और इस सिलसिले में नृत्यगोपाल दास से भी भेंट की है। राम मंदिर निर्माण के लिए मुसलिम समाज आगे आ रहा है, ऐसे में इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। इसके लिए हिंदू और मुसलिम समाज के बुद्धिजीवियों को सकारात्मक मार्ग प्रशस्त करना होगा।
’कांतिलाल मांडोत, सूरत
स्त्री का भय

निर्भया कांड मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत का सजा का फैसला पुराना भी नहीं पड़ा था कि सोनीपत, हरियाणा के एक गांव कालूपुर में इसी की तरह की भयंकर घटना घट गई। एक दलित महिला के साथ उसी की जाति के मुख्य आरोपी ने जिस तरह दर्दनाक घटना को अंजाम दिया, उससे महिलाओं की सुरक्षा पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। अगर प्रशासन महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समय रहते कदम उठाए, तो ऐसे प्रकरण होने ही नहीं पाएंगे। अच्छी बात है कि इस मामले को समाचार पत्रों ने प्रमुखता दी और हरियाणा सरकार ने इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग कर डाली और निर्भया कांड की तरह इसकी भी शीघ्र सुनवाई करने के लिए राज्य सरकार तैयार हो गई। आखिरकार उस महिला का कसूर क्या था, जिसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। समय-समय पर कानून में बदलाव कर महिला सुरक्षा पुख्ता करने की बात की जाती है, पर वैसा हो नहीं पाता। अब जरूरी हो गया है कि कालूपुर कांड में निर्भया कांड की तरह अपराधियों को कठोर सजा मिले।
’विजय कुमार धानिया, दिल्ली विश्वविद्यालय

मोदी सरकार के 3 साल: 61 प्रतिशत लोगों का कहना- 'सरकार उम्मीदों पर खरी उतरी'

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