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रेलवे ने अतीत के हादसों से कोई सबक नहीं सीखा

एक तरफ भारतीय रेलवे बुलेट ट्रेनका सपना साकार करने पर आमादा है मगर दूसरी ओर रेल पटरियां सामान्य रफ्तार झेलने में भी नाकाम हैं।

Author August 28, 2017 7:27 AM
रेलवे ने हाल ही में हमसफर एक्सप्रेस शुरू की थी जिसमें केवल 3 एसी कोच थे और इसके सकारात्मक परिणाम मिले। (Representative Image)

बिम्सटेक का सफर

हाल में ही नेपाल में बिम्सटेक की विदेशमंत्री स्तर की बैठक हुई। पिछले कुछ सालों में यह क्षेत्रीय संगठन भारत तथा पड़ोसी देशों के लिए सबसे लोकप्रिय और उपयोगी मंच बन कर उभरा है। 1997 में स्थापित यह बहुआयामी मंच सार्क के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल, आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान के अड़ियल रुख के चलते सार्क की उपयोगिता कम होती जा रही है। सार्क की पिछली बैठक जो पाकिस्तान में होनी थी, भारत के साथ-साथ श्रीलंका और भूटान के विरोध के चलते स्थगित हो गई थी।
बिस्मटेक की नेपाल में हुई बैठक में आतंकवाद के प्रति कड़ा रुख अपनाए जाने, क्षेत्रीय सहयोग वृद्धि, शांति व स्थिरता के लिए मिलकर काम करने की बात कही गई है। इस साल बिम्सटेक की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इन दो दशकों में इस संगठन ने आपसी सहमति, सहयोग के मसले पर काफी प्रगति की है। विज्ञान, तकनीक, क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, व्यापार, संपर्क जैसे महत्त्वपूर्ण मसलों पर काफी प्रगति हुई है। 2014 में ढाका में इसका सचिवालय स्थापित किया गया था। 2016 में भारत ने गोवा में आयोजित ब्रिक्स देशों की बैठक के साथ इस संगठन के सदस्य देशों को आमंत्रित कर, इसके बढ़ते महत्त्व को

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प्रतिबिंबित किया था।
बिम्सटेक, भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के नजरिये से काफी महत्त्व रखता है। भारत, म्यांमा और थाईलैंड के बीच त्रिपक्षीय मार्ग बनाने की बात की जा रही है। भारत-म्यांमा-कलादान मल्टीमॉडल मार्ग को भी स्थापित किया जाना है। यह भारत के पूर्वोत्तर भाग में नए विकास के लिए काफी अहम साबित होगा। भारत ने इस साल साउथ एशिया सेटेलाइट को प्रक्षेपित किया है जो इस क्षेत्र के देशों को निशुल्क उपग्रह सेवाओं के लाभ प्रदान करेगा। आशा की जा सकती है कि भारत इस मंच को अपने अनुभव, प्रगति को साझा करते हुए नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।
’आशीष कुमार, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

हादसों का सबक
देश में आए दिन हो रही रेल दुर्घटनाएं साबित करती हैं कि रेलवे ने अतीत के हादसों से कोई सबक नहीं सीखा है। एक तरफ भारतीय रेलवे बुलेट ट्रेनका सपना साकार करने पर आमादा है मगर दूसरी ओर रेल पटरियां सामान्य रफ्तार झेलने में भी नाकाम हैं। मुजफ्फरनगर के भयावह हादसे में तेईस यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उस हादसे पर प्रधानमंत्री, रेलमंत्री, मुख्यमंत्री व अधिकारियों ने संवेदना व्यक्त करते हुए जांच-पड़ताल के आदेश दिए। सवाल है कि हर रेल दुर्घटना पर ऐसी रस्मअदायगी करके क्या कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है? क्या ऐसे हादसे रुक जाते हैं?
जर्जर ढांचा, लचीली निगरानी, लापरवाही, रेलवे क्रासिंग पर कर्मचारी न होना, निम्न स्तर के सुरक्षा पैमाने, प्रशिक्षित तकनीकी स्टॉफ का अभाव, तमाम समितियों की सुरक्षा सिफारिशों को अनसुना करना आदि से रेलवे को दो-चार होना पड़ता है। रेल हादसों को रोकने और सुरक्षित यात्रा के लिए जापान की तर्ज पर ईएमयू प्रणाली अपनानी चाहिए। नई प्रौद्योगिकी अमल में लाई जाए। समय-समय पर निरीक्षण, कलपुर्जों, लाइनों की देखरेख बेहद जरूरी है। रेल दुर्घटनाओं से फिर जन-धन की भारी क्षति न हो, इसके लिए पुख्ता इंतजाम करने की जरूरत है।
’नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर, हरियाणा

विज्ञान के बजाय
किशोरावस्था में विज्ञान पर निबंध में हम अक्सर लिखते थे कि आज का युग विज्ञान का है। सुबह उठने से रात को सोने तक हम जितनी भी चीजों को उपयोग में लाते हैं, वे सभी विज्ञान की देन हैं, वगैरह-वगैरह। बहरहाल, हम विज्ञान की बदौलत सुख तो भोगते हैं मगर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त नहीं करते। अगर करते, तो हमारे घर की दीवारों पर उन वैज्ञानिकों की तस्वीरें होतीं जिनकी वजह से आज हम एक बेहतर और अपेक्षया सुरक्षित जीवन जी रहे हैं। ठगों की चरण वंदना करने में हमें कोई परेशानी नहीं पर इस विश्व को रोशनी से जगमग करने वाले, यातायात के साधनों की वजह से इस दुनिया को एक गांव में तब्दील करने वाले और हजारों किलोमीटर दूर किसी से बतियाने के लिए संचार प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले वैज्ञानिकों की जय करना तो दूर हम उनके नाम तक नहीं जानते।
आजकल हम फिर एक बार उन कथाओं के मुरीद होते जा रहे हैं जिनमें आस्था रखने की वजह से हम दुनिया के गरीब देशों की पंक्ति में आज भी खड़े हैं। कल एक खबरिया चैनल का एंकर बता रहा था कि अमुक मंदिर में जाने से सांप काटे इंसान की मौत नहीं होती। ऐसे में सर पीटने से भी क्या होगा?
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली

अस्वस्थ सिनेमा
निस्संदेह सिनेमा एक समर्थ विधा है और समाज के सभी वर्गों पर इसका प्रभाव पड़ता है। खासकर बच्चों और युवाओं पर तो इतना असर होता है कि वे फिल्मी तौर-तरीकों को ही अपने जीवन में उतारने लगते हैं चाहे वे समाज हित में हों या न हों। फिल्म अगर नैतिक और सामाजिक मूल्यों से संबंध रखती है तो बेशक एक अच्छे समाज-निर्माण में योगदान देती है। सभी लोग इन्हें देखकर कुछ अवश्य सीखते हैं और समाज में नैतिक मूल्य प्रबल होते हैं। ऐसा कमाल पुरानी फिल्मों में था जिनकी कथा सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों से ओतप्रोत रहती थी। लेकिन दुख की बात है कि पिछले लगभग दो दशकों से हमारे सिनेमा का पूरी तरह से बाजारीकरण हो गया है। फिल्में अपराध, हिंसा और अश्लीलता ही परोस रही हैं और हमारे निरर्थक टीवी सीरियल भी फिल्मों की लीक पर चल रहे हैं। ये चैनल दर्शकों की रुचि को न देख कर बस अपनी पौ बारह करने में जुटे हैं।
अफसोस की बात है कि हिंसा और सेक्स से भरपूर फिल्में हमारे बच्चों और युवाओं के दिमाग को कुंद कर रही हैं। फिर भी अधिकतर मुंबइया फिल्मों के निर्माता-निर्देशक नग्नता को ही अभिनय मान बैठे हंै और पश्चिमी संस्कृति से लबालब हमारे लोकप्रिय सितारे स्वयं को अभिनय का सरताज मान रहे हैं। खेद की बात है कि हमारा सेंसर बोर्ड इन अश्लील फिल्मों को हरी झंडी दिखा देता है।
’रमेश शर्मा, केशवपुरम, दिल्ली

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