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चौपाल: बजट की पटरी

भारतीय रेल देश की आत्मा है, एक लघु भारत को हम प्रतिदिन ढाई करोड़ यात्रियों के तौर पर रेलगाड़ियों में यात्रा करते देखते हैं।

Author September 27, 2016 5:20 AM
भारतीय रेल। (चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।)

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेल बजट के आम बजट में विलय प्रस्ताव को मंजूरी देकर नई शुरुआत की है। क्या यह 1924 से जारी एक परंपरा को समाप्त कर नई परंपरा की नींव डालने का ही प्रश्न है या इसके और भी निहितार्थ हैं? तर्क दिए जा रहे हैं कि इस कवायद से रेल विभाग को 9700 करोड़ रुपए का लाभांश सरकार को नहीं चुकाना पड़ेगा और उसे लाभ पहुंचेगा। रेल और वित्त दोनों एक ही सरकार के दो विभाग हैं। ऐसे में एक विभाग द्वारा दूसरे विभाग को लाभांश का भुगतान करने या न करने से सकल रूप से देश को क्या फर्क पड़ेगा? जाहिर है, यह गढ़ा गया तर्क है जो इस बजट विलय के असली एजेंडे को छुपाने के लिए प्रस्तुत किया गया है। यह प्रस्ताव रेल, सड़क, विमानन और जहाजरानी विभाग को मिला कर परिवहन विभाग बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है जिसकी अगली कड़ी निवेशकों के लिए एक नीति, परिवहन सबसिडी की समाप्ति, किराए में एकरूपता की होगी। स्वाभाविक रूप से निवेशकों को इससे लाभ होगा और जनता के यात्रा व्यय में बढ़ोतरी होगी।

भारतीय रेल देश की आत्मा है, एक लघु भारत को हम प्रतिदिन ढाई करोड़ यात्रियों के तौर पर रेलगाड़ियों में यात्रा करते देखते हैं। पृथक रेल बजट से इस सहज, सुगम, सुलभ परिवहन सेवा के लिए सरकारें चाहे-अनचाहे जन दबाव महसूस करती थीं और जनता पर बोझ डालने के पूर्व गंभीरता से विचार करती थीं। रेल बजट के लिए रेल सेवा में सुधार, विस्तार, उन्नयन और यात्री सुरक्षा के मुद्दों पर लोकसभा और राज्यसभा में विमर्श होता था और जन हितैषी निर्णय के लिए सरकारों पर दबाव बनाया जाता था। देश भर में अर्थशास्त्री, विचारक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता गोष्ठियों, चर्चाओं और प्रतिक्रियाओं के जरिए विभिन्न आयामों से अपना पक्ष रखते थे और रेल विभाग को जनता की उम्मीदों, आशाओं व अपेक्षाओं के साथ अपनी कमजोरियां जानने का अवसर प्राप्त होता था। आम बजट में रेल बजट के विलय से यह पक्ष धुंधला जाएगा।

आज लोक कल्याण का विचार सरकार के स्तर पर लगातार छीजता जा रहा है और योजना आयोग को नीति आयोग, अपंग को दिव्यांग, निर्मल भारत को स्वच्छ भारत, रेसकोर्स रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग करने तक सीमित रह गया है। यह प्रस्ताव निजी क्षेत्र को बढ़ावा, प्रोत्साहित करने और लाभ पहुंचाने के छिपे एजेंडे का हिस्सा ही है।
इसी तरह पूर्व में डाक विभाग के बजट को समाप्त किया गया था और हमें याद है कि पोस्ट कार्ड, मनीआर्डर व अंतदेर्शीय पत्र जैसे जनोपयोगी माध्यमों की दरों की वृद्धि करने में सरकारें संकोच महसूस करती थीं। सूचना व संचार क्रांति ने डाक विभाग की आवश्यकता भले ही घटाई हो पर उसके समांतर बढ़ावा दी गई निजी कोरियर सेवाओं के भार-वहन को हम सब विवश हैं और उसके खिलाफ कहीं आवाज नहीं उठाई जा सकती है।

रेल बजट विलय का यह प्रस्ताव दबे-छुपे रेल के निजीकरण के प्रयासों को तीव्र करने और आमजन को सहज, सुगम, सुलभ व सस्ती परिवहन सुविधा से विमुख करेगा। भारतीय रेल का सार्वजनिक स्वरूप बना रहे, रेल को लाभ-हानि के गणित से परे जनोपयोगी सुविधा बनाए रखने के लिए इस प्रस्ताव को अविलम्ब वापस लेने के लिए जनदबाव बनाना चाहिए।
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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