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कांग्रेसी लोकतंत्र

राहुल गांधी कभी भी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। पिछले दो साल से यह घोषणा निरंतर होती आ रही है।
Author October 24, 2017 01:09 am
गांधी नगर में जनसभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी। (फोटो- ANI)

कांग्रेसी लोकतंत्र
राहुल गांधी कभी भी कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं। पिछले दो साल से यह घोषणा निरंतर होती आ रही है। सवाल है कि इस दौरान उनका चुनाव क्यों नहीं किया गया? क्यों नहीं आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक बुला कर उन्हें निर्वाचित अध्यक्ष बनाने का प्रयास हुआ? उनकी माता सोनिया गांधी भी 1998 में बगैर चुनाव ही अध्यक्ष बन बैठीं और तब से अब तक चली आ रही हैं। आजाद भारत में केवल दो नेता- पुरुषोत्तम दास टंडन (1950) और के ब्रह्मानंद रेड्डी (1977) ही विधिवत आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) द्वारा किए गए निर्वाचन के बाद कांग्रेस के सदर बने हैं, बाकी तमाम लोग पिछले अध्यक्ष अथवा कार्यसमिति द्वारा मनोनीत ही होते आए।

अपनी स्थापना के बाद कांग्रेस 1940 तक प्रतिवर्ष अध्यक्ष का चुनाव करती थी। फिर मौलाना आजाद छह साल बिना पुनर्निर्वाचन अध्यक्ष रहे, क्योंकि एआइसीसी की बैठक बुलाई नहीं जा सकी। इंदिरा गांधी ने कांग्रेस संविधान में संशोधन करा कर एक वर्ष की जगह तीन वर्ष का प्रावधान किया लेकिन तीन वर्ष बाद भी चुनाव नहीं कराए जा रहे। चुनाव आयोग ने पार्टी को पिछली 30 जून तक चुनाव कराने का निर्देश दिया था। उसका भी उसने पालन नहीं किया। आतंरिक लोकतंत्र का यह हाल है इस पार्टी में!

जो दल अपने भीतर इस कदर अलोकतांत्रिक हो, दल के बाहर वह लोकतंत्र को ठेंगे पर रखेगा कि नहीं? इसीलिए कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों ने 60 वर्षों में 106 बार अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर विपक्षी सरकारें बर्खास्त कीं। आतंरिक आपातकाल लगा कर इसी पार्टी की इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों को देश-निकाला दिया। और तुर्रा देखिये, इसी पार्टी के नेता चिल्ला-चिल्ला कर भाजपा और मोदी पर तानाशाही के इल्जाम लगाते फिरते हैं!
’अजय मित्तल, मेरठ

विश्वास का संकट
पिछले दिनों जो एक खास बात देखने में आई वह यह कि जिन हिंदू और मुसलिम भारतीयों में धर्म की भिन्नता के बावजूद गहरी मैत्री और आत्मीयता है उन्होंने प्रमुख धार्मिक त्योहारों पर एक-दूसरे को बधाई देने में अतिरिक्त तत्परता का प्रदर्शन किया है। हिंदुओं ने अपने मुसलिम दोस्तों को ईद के दिन जरूर याद किया है और मुसलिम मित्रों ने दीपावली पर कई-कई बार और कई-कई तरह से प्रयत्न करके हिंदुओं को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। इन मौकों पर अन्य तरीकों से एक-दूसरे के धर्मों के प्रति दिखाए आदर ने भी इन मित्रों के मन में खुशी का संचार किया है।

इस व्यवहार के मूल में कहीं न कहीं अविश्वास का वह भय रहा है जो हिंदू कट्टरवादियों ने तरह-तरह की गतिविधियों से धर्मनिरपेक्ष लोगों के मन में पैदा किया है। ‘कहीं मेरे मित्र के मन में भी इन बातों से प्रभावित होकर मेरे प्रति प्रेम में कोई कमी तो नहीं आ गई है’- सरीखे संदेह का निवारण अब जैसे हर ऐसे दोस्त को आवश्यक लगने लगा है। पर इसमें कोई शक नहीं कि विश्वास का यह संकट भारत जैसे गंगा-जमुनी संस्कृति वाले देश में हिंदू-मुसलिम संबंधों को कमजोर करने के बजाय और ज्यादा मजबूत करेगा।
’सदाशिव श्रोत्रिय, नाथद्वारा, राजस्थान

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