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फिल्म के बहाने

पुरातनपंथी ‘पद्मावती’ के बहाने जौहर प्रथा का महिमामंडन कर रहे हैं। ये देश को फिर पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी की रूढ़ियों के दलदल में धकेल कर अपने पुरुषवादी अहं की तुष्टि स्त्रियों के माध्यम से, उन्हें ढाल बना कर करना चाहते हैं।

Author January 22, 2018 02:30 am
फिल्म “पद्मावत’ में दीपिका पादुकोण।

ह खबर विचलित करने वाली है कि ‘पद्मावत’ फिल्म के विरोध में अठारह सौ महिलाओं ने जौहर के लिए पंजीयन कराया है। पुरातनपंथी ‘पद्मावती’ के बहाने जौहर प्रथा का महिमामंडन कर रहे हैं। ये देश को फिर पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी की रूढ़ियों के दलदल में धकेल कर अपने पुरुषवादी अहं की तुष्टि स्त्रियों के माध्यम से, उन्हें ढाल बना कर करना चाहते हैं। क्या इनमें से कोई पुरुष ‘पद्मावत’ फिल्म के प्रदर्शन के विरोध में सचमुच अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार है? या यह सारा उपद्रव और वितंडा राजपूत गौरव के नाम पर राजस्थान विधानसभा के आगामी चुनाव में सियासी लाभ हासिल करने का दांव भर है सुप्रीम कोर्ट ने ‘पद्मावत’ के प्रदर्शन पर प्रतिबंध से संबंधित चार राज्य सरकारों द्वारा जारी की गई अधिसूचना/आदेशों को खारिज कर स्पष्ट आदेश दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध उचित नहीं है। प्रधान न्यायाधीश ने यहां तक कहा कि ‘अगर फिल्म पर प्रतिबंध की बात करेंगे तो साठ प्रतिशत से ज्यादा भारतीय साहित्य पढ़ने लायक नहीं रह जाएगा।’ माननीय न्यायालय ने राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्यों का संवैधानिक दायित्व है।

इस स्पष्ट आदेश के बावजूद मध्यप्रदेश, हरियाणा और गुजरात के मंत्रियों के जो बयान मीडिया में आए हैं, उनमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना का स्वर ही ध्वनित हो रहा है। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री ने कह दिया, ‘आदेश का परीक्षण करने के बाद ही कोई फैसला लेंगे।’ हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री का फरमाना था कि ‘सुप्रीम कोर्ट ने राज्य का पक्ष सुने बगैर आदेश दिया है।’ गुजरात के गृहमंत्री भी कह रहे हैं कि ‘आदेश का परीक्षण करने के बाद कदम उठाया जाएगा।’ इन मंत्रियों ने यह नहीं कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं तथा राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे। इन राज्यों के मंत्रियों से बेहतर प्रतिक्रिया राजस्थान के गृहमंत्री ने दी है कि वे ‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं तथा राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सब कुछ करेंगे।’फिल्म पर प्रतिबंध लगाने वाले राज्यों की मंशा शुरू से ही इसे लेकर हुए उपद्रव से राजनीतिक फायदा उठाने की रही है। इन राज्यों की सरकारें उपद्र्रव के जरिए राजपूत समाज का ध्रुवीकरण कर राजनीतिक फायदा उठाना चाहती हैं। अन्यथा, इतनी हिंसा और उपद्रव के बाद भी स्वयंभू नेता मीडिया में भड़काऊ बयान कैसे दे रहे हैं? उनके विरुद्ध कानून के तहत अभी तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई है? अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए ये 25 जनवरी को ‘जनता कर्फ्यू’ लगाने की धमकी दे रहे हैं। क्या इन राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रशासन ने आंखों पर पट्टी बांध रखी है और कानों में तेल डाल रखा है, कि इन्हें न कुछ दिख रहा है और न सुनाई दे रहा है!
’प्रवीण मल्होत्रा, इंदौर

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