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चुनाव पर नजर

आमतौर पर आरएसएस और भाजपा की छवि दलित विरोधी मानी जाती है। लेकिन 2014 के आम चुनावों और उसके बाद राज्य के सभी चुनावों में दलित तबके में भाजपा ने पैठ बनाने की कोशिश की है। दलित राष्ट्रपति बना कर भाजपा और आरएसएस उसे मजबूत करना चाहते हैं।

Author June 21, 2017 05:07 am
रामनाथ कोविंद भारत के 14वें राष्ट्रपति बन गए हैं। उन्होंने यूपीए की उम्मीदवार मीरा कुमार को हराकर यह चुनाव जीता है। (Source: AP Photo)

मीडिया की तमाम आंशकाओं को मात देते हुए भाजपा की ओर से बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया गया है। चर्चा इसलिए जोरों पर है कि कोविंद दलित समुदाय से आते हैं। नब्बे के दशक वह दौर था, जब देश में दलित समुदाय के लोगों के कत्लेआम की खबरें आम थीं। दलितों पर हो रहे अत्याचारों के सिलसिले में दलित सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल जब तत्कालीन राष्ट्रपति से मिलने गया तो उन्होंने दलित सांसदों से मिलने से मना कर दिया। उसी समय से देश में दलित राष्ट्रपति की मांग जोर पकड़ने लगी। इसी दबाव के कारण केआर नारायणन राष्ट्रपति बने। लेकिन वर्तमान समय और उस समय की परिस्थितियों में आधारभूत अंतर है। उस समय दलित सांसद एकजुट होकर लगातार दबाव बनाए हुए थे, लेकिन आज अनुसूचित जाति की आरक्षित सीट से भी जीत कर आने वाले लगभग सभी सांसदों ने सुविधा की चुप्पी ओढ़ी हुई है। हाल के समय में किसी दलित को राष्ट्रपति बनाए जाने जैसी कोई चर्चा या दबाव नहीं था। आमतौर पर आरएसएस और भाजपा की छवि दलित विरोधी मानी जाती है। लेकिन 2014 के आम चुनावों और उसके बाद राज्य के सभी चुनावों में दलित तबके में भाजपा ने पैठ बनाने की कोशिश की है। दलित राष्ट्रपति बना कर भाजपा और आरएसएस उसे मजबूत करना चाहते हैं।

दलित राजनीति की शुरुआत आजादी के पहले से ही हो चुकी थी, जिसका श्रेय बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को ही जाता है, जिनकी छवि दलितों में आज भी एक मसीहा के रूप में बनी हुई है। हालांकि दलितों का यह करिश्माई नेता कांग्रेस से बाहर ही रहा, लेकिन बाबा साहब के देहांत के बाद बाबू जगजीवन राम को दलितों ने अपने नेता के रूप में स्वीकार किया। शायद यही कारण था कि लंबे समय तक दलित कांग्रेस का वोटबैंक बने रहे। बाबू जगजीवन के बाद कांशीराम ने दलित नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। लेकिन उनकी राजनीति उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रही। फिर कांशीराम की विरासत मायावती तक पहुंची।भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद बिना किसी दबाव के किसी दलित को राष्ट्रपति बनाने की पेशकश से यह तो साफ जाहिर होता है कि आज दलित समुदाय एक राजनीतिक ताकत के रूप में उभरा है। किसी भी चुनाव से पहले लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के द्वारा होटल से खाना ले जाकर दलितों के घर जाकर खाना और फोटो खिंचवाना आम बात है। लेकिन यह समझना आवश्यक है कि आखिर दलितों की इस मनुहार का असली कारण क्या है। 1996 के आम चुनाव में देश का मतदान प्रतिशत 58 था, लेकिन दलितों में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत था। 1998 में 62 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया, जबकि दलितों में यह आंकड़ा 67 प्रतिशत था। इसके बाद के चुनावों में भी दलितों का मतदान प्रतिशत देश के मतदान प्रतिशत से ज्यादा ही है। यानी इन आंकड़ों से यह बात साफ है कि अन्य समुदायों की तुलना में दलित वर्ग मतदान में ज्यादा विश्वास व्यक्त करता है। यही कारण है कि सभी पार्टियां दलितों को अपने पाले में करना चाहती है।

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने के फैसले में दलितों से सहानुभूति कम, अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश ज्यादा नजर आती है। जिस व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है, उनके दलित होने का पता देश को उनके नाम के ऐलान के बाद मालूम हुआ। कोविंद ने कभी भी सड़क से लेकर संसद तक, कहीं भी दलितों के लिए आवाज नहीं उठाई है। भाजपा के द्वारा एक ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने की कोशिश, जिनका दलित संघर्ष से कोई लेना देना नहीं है, आगामी चुनावों की तैयारी से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
’सूरज कुमार बैरवा, राजस्थान विवि, जयपुर

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