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विश्व धरोहर दिवस: देश के अतीत पर गर्व करते हैं आप लेकिन इसकी धरोहरों के लिए क्या करते हैं?

आज विश्व धरोहर दिवस है तो हमें इसी बहाने अपनी ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक धरोहर की सुध ले लेनी चाहिए।

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आज विश्व धरोहर दिवस है तो हमें इसी बहाने अपनी ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक धरोहर की सुध ले लेनी चाहिए। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने लगभग चार हजार स्मारकों/ स्थलों को राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित किया है जिनमें 35 संपत्तियां यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। प्राचीन स्मारक और पुरातत्त्व स्थल व अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत किसी भी संरक्षित स्मारक के आसपास 100 मीटर और सामने की ओर 200 मीटर की परिधि के निषिद्ध क्षेत्र की सीमाओं से यदि कोई छेड़छाड़ करता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है और उल्लंघन सिद्ध होने पर एक लाख का जुर्माने व दो साल की कैद का प्रावधान है। लेकिन हकीकत में इस कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इन स्थलों की हालत यह है कि कहीं मवेशी बांधने के अड्डे बने हुए हैं तो कहीं उपले (कंडे) पथ रहे हैं। यहां तक कि संरक्षित भूमि पर भू-माफियाओं का कब्जा भी हो चुका है। पुरातत्त्व विभाग की भारी भरकम फौज सिर्फ तमाशा देख रही है। इन धरोहरों की दुर्दशा का जिम्मेदार पुरातत्त्व विभाग तो है ही, नागरिक भी इनकी दुर्दशा में बराबर के भागीदार हैं। सभी का कर्तव्य है कि अपनी धरोहर की हिफाजत करें और इन्हें संजोने और बचाव के लिए सुनिश्चित प्रयास करें, तभी हम अपनी धरोहरों को आने वाली पीढ़ी को सौंप सकते हैं।

आगरा एक ऐतिहासिक शहर है जिसे ताजमहल की वजह से विश्व भर में जाना जाता है। यहां के तीन स्मारक विश्व धरोहर सूची में भी शामिल हैं। इनके अलावा 65 से अधिक स्मारक भारतीय पुरातत्त्व विभाग में भी संरक्षित हैं। इसके बावजूद ठीक प्रकार से देखभाल न होने के कारण ये दुर्गति का शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि संरक्षित भूमि पर कब्जे भी हो चुके हैं। पुरातत्त्व विभाग और प्रशासन को चाहिए कि वे सख्त कदम उठाकर इन्हें कब्जामुक्त कराएं। इसके साथ ही स्मारकों से छेड़छाड़ करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाए ताकि हमारी धरोहर महफूज रह सके और पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। इसके अलावा जो स्मारक संरक्षण के अभाव में खंडहर हो रहे हैं उन्हें संरक्षित कर उनका जीर्णोद्धार कराया जाए। –मोहम्मद आकिब खान, आंबेडकर विवि, आगरा
बदहाल नौनिहाल

हम तमाम तरह की समस्याओं-कुरीतियों से आजादी पाने में अब भी विफल रहे हैं। हमारे राष्ट्र का भविष्य मासूम बच्चे अनवरत कुपोषण, अशिक्षा और मानव तस्करी के गहरे दलदल में फंसते जा रहे हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 70 फीसद बच्चे खून की कमी के शिकार हैं। हर तीन में से एक बच्चा कम वजन वाला है और इस सबका कारण कुपोषण है। बाल शिक्षा की तरफ ध्यान तो शायद ही सरकारों का जाता है। नतीजतन, बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल जाने के बजाय भीख मांगने, मजदूरी करने की ओर रुख कर लेते हैं। बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने बच्चों को कुपोषण एवं अन्य रोगों से बचाने एवं स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने के लिए प्रतिबद्धता का निर्देश दिया गया था लेकिन हमारी सरकारों का लापरवाह रुख स्थिति को भयावह बनाता जा रहा है।

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में कुल 19,223 महिलाओं और बच्चों की तस्करी की गई। हाल ही में भारत के पांच राज्यों में चुनाव हुए लेकिन किसी भी एक रैली में बाल शिक्षा या बाल मजदूरी संबंधी एक भी घोषणा नहीं की गई। लोकतंत्र के इस विशाल पर्व में बच्चों पर अमूमन ध्यान इसलिए नहीं जाता कि वे वोटर नहीं हैं। चुनावी आपाधापी में हम अपने बच्चों को हाशिये पर रखते जा रहे हैं। स्मार्ट सिटी बनाने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन पहले राष्ट्र का आधार मजबूत किया जाना चाहिए। प्राथमिक शिक्षा पर जोर देना चाहिए। आज गांव के स्कूल, विद्यालय कम रसोईघर ज्यादा बन गए हैं। राजनीतिक एजेंडे में बच्चों को रखा जाना बहुत जरूरी है। – नवीन राय, नोएडा

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