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नीतीश बनाम लालू

इन दो नेताओं में बड़ा अंतर यह है कि एक ने जो सिद्धांत तय किया उससे कभी डिगा नहीं। दूसरी ओर उसी ने प्रशासन का बेहद खराब उदाहरण दिया। दूसरे का कभी कोई सिद्धांत नहीं रहा, घोषित तौर पर अवसरवादी रहा।
Author August 1, 2017 05:54 am
लालू प्रसाद यादव (बाएं) के साथ बिहार के सीएम नीतीश कुमार। (Photo: PTI)

सन 1989 के भागलपुर दंगों की पृष्ठभूमि में हुए चुनावों में बिहार विधानसभा के भीतर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरे जनता दल ने लालू प्रसाद यादव को अपना नेता चुना और 1990 में भाजपा के समर्थन से वे पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। जल्द ही रामरथ लेकर निकले आडवाणी को गिरफ्तार कराया, गठबंधन टूटा और अपना राजनीतिक सिद्धांत यहीं पर तय कर लिया। यह सिद्धांत दंगों के आरोपी यादवों को सजा न दिलवा कर और मुसलमानों को अमन का ठोस भरोसा देकर ‘माई’ समीकरण में साथ-साथ साध कर और भी पुख्ता हुआ। सत्ता में रहने के शुरुआती दिनों में तेज कायम रहा, उन्होंने पिछड़ों को आवाज दी और जिन दलों का विरोध किया उनसे अपने बुरे से बुरे वक्त में भी कभी हाथ नहीं मिलाया। समय-समय पर गठबंधन किया तो कांग्रेस से और अलग भी हुए तो उसी से। बाद में घर वापसी भी उसी में हुई।

इसके उलट बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का उदय जॉर्ज फर्नांडीज के संरक्षण में, जातिवाद विरोध से शुरू हुआ। कम्युनिष्टों के साथ तालमेल में चुनाव लड़ने के बाद नीतीश कुमार राजग के पिछड़े चेहरे के बतौर भाजपा के साथ हो लिए। उससे मिल कर तीन सरकारें बनाने के बाद महत्त्वाकांक्षा बढ़ी और अठारह साल तक संघ-भाजपा के साथ रहने के बाद अलग हो लिए। संघ मुक्त भारत बनाने के लिए निकले। जनता दल को फिर एक करने पर जोर लगाया। चिर विरोधी राजद-कांग्रेस के साथ सरकार बनाई और मोदी के विरोध में मजबूती से खड़े विपक्षी की भूमिका निभाते हुए अचानक धड़ाम से उन्हीं के पहलू में गिरे।

कभी के एक रहे इन दो नेताओं में बड़ा अंतर यह है कि एक ने जो सिद्धांत तय किया उससे कभी डिगा नहीं। दूसरी ओर उसी ने प्रशासन का बेहद खराब उदाहरण दिया। दूसरे का कभी कोई सिद्धांत नहीं रहा, घोषित तौर पर अवसरवादी रहा। बावजूद इसके सरकार चलाने का उसका रिकॉर्ड अच्छा रहा। मंडल आंदोलन से निकले इन दोनों पिछड़ों के नेताओं में एक समानता यह रही कि सिद्धांत की प्रखरता और सुशासन की चमक के बावजूद चालीस लोकसभा सीटों वाले सूबे की ग्यारह करोड़ आबादी के ये कभी जन-नेता नहीं बन सके। जिस वर्ग पर इनकी राजनीति लक्षित रही, राज्य में उसकी आबादी अस्सी प्रतिशत से ज्यादा होने के बावजूद ये हमेशा किसी न किसी के पिछलग्गू बने ही रहे। ममता बनर्जी, जयललिता और नवीन पटनायक जैसी स्थिति इन्हें कभी नहीं मिली। जबकि जिस वर्ग से ये सभी राजनेता आते हैं इनके राज्यों में उसकी बहुसंख्या नहीं है। बहरहाल, एक ओर प्रखर सिद्धांत से लिपटे कुशासन का उदाहरण है तो दूसरी ओर जबर्दस्त सियासी अवसरवाद के साथ ठीक-ठाक गवर्नेंस। लालू और नीतीश के रूप में देश की राजनीति की इन दोनों धुरियों में से आने वाले वक्त में कौन प्रासंगिक रहेगा यह देखने वाली बात होगी। मगर सबके बाद तमाम राजनीतिक प्रयोगों की तरह इस ताजा बहस का श्रेय फिर से बिहार को ही मिलेगा। उस बिहार को, जो देश को दिशा देता है मगर अपने ‘स्व’ को कहीं बड़े बियाबान में खो बैठा है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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