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चौपाल- सफाई का सरोकार, छद््म अभियान

पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि देश में मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरमाया था- पहले शौचालय फिर देवालय।
Author November 6, 2017 05:01 am
जिले में प्रशासन तानाशाही कार्रवाई करके लोगों को शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित कर रही है।

सफाई का सरोकार
महात्मा गांधी कहते थे कि स्वच्छता राजनीतिक आजादी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि देश में मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरमाया था- पहले शौचालय फिर देवालय। अलग-अलग समय और संदर्भों में कहे गए ये वाक्य केवल तालियां बटोरने के लिए नहीं बोले गए, बल्कि ये भारत में स्वच्छता की कड़वी सच्चाई बयान करते हैं ।जब तीन साल पहले 2 अक्तूबर 2014 को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ शुरू किया गया था तो देश में ग्रामीण स्वच्छता का दायरा सिर्फ 39 प्रतिशत था। आज यह बढ़ कर 69 प्रतिशत तक पहुंच गया है। ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में खुले में शौच करने वाले भारतीयों की संख्या 2014 में करीब साठ करोड़ थी जो घट कर अब तीस करोड़ हो गई है। गांवों, जिलों और राज्यों में खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। अब तक देश भर के 2.45 लाख गांव, 1,300 शहर, 200 जिले और पांच राज्यों (हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, सिक्किम व केरल) को खुले में शौच की समस्या से मुक्त घोषित किया जा चुका है। मार्च 2018 तक दस और राज्य इस सूची में शामिल हो जाएंगे। हालांकि कुछ राज्यों में स्वच्छ भारत मिशन के लक्ष्यों को हासिल करने की गति धीमी है। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना अभी पचास फीसद के आसपास लटके हैं; वहीं बिहार, ओड़िशा, जम्मू-कश्मीर अन्य राज्यों से काफी पीछे हैं। महज 29.01 प्रतिशत के आंकड़े के साथ बिहार ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण में सबसे फिसड्डी राज्य है।

स्वच्छता के लिए दिल्ली मेट्रो ने जो मिसाल पेश की है वह अन्य सार्वजनिक स्थलों के लिए काफी प्रेरणा दे सकती है। अपने सीमित क्षेत्र में ही सही, पर इसने सफाई को एक सामाजिक मूल्य के रूप में न केवल स्थापित किया है बल्कि यात्रियों में इसकी स्वीकार्यता भी बनाई है। यह इस बात का ठोस सबूत है कि अगर दंड और प्रोत्साहन की दोतरफा नीति को प्रभावी ढंग से अमल में लाया जाए तो कुछ ही वर्षों में सरकारी दफ्तर, अस्पताल, सड़कें और गली-मुहल्ले चमकते-दमकते नजर आ सकते हैं। इसके अलावा प्रदूषण को रोकना तथा साफ-सफाई के कार्य को स्कूली-स्तर पर पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा ताकि बच्चों को बचपन से स्वच्छता का महत्त्व पता चल सके। साथ ही, माध्यमिक व उच्च शिक्षा में भी स्वच्छता के अध्याय को सैद्धांतिक तथा प्रायोगिक रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इससे भविष्य में स्वच्छता का माहौल निर्मित करने में मदद मिलेगी।
’कैलाश मांजू बिश्नोई, जोधपुर
छद््म अभियान
आरक्षण जिस भावना के साथ दिया गया था उस भावना से इसे कभी लागू करने का प्रयास नहीं किया गया। जब कार्यपालिका इसे ठीक से लागू ही नहीं कर पाई तो न्यायपालिका ने सवाल उठाया है कि एससी-एसटी (अनुसूचित जाति-जनजाति) में क्रीमीलेयर क्यों न हो! यह मामला अब संविधान पीठ सुनेगी। खैर, क्रीमीलेयर का पहला जवाब तो यह है कि एससी-एसटी को जमीन रखने का अधिकार हजारों सालों से नहीं था और आरक्षण की बदौलत अगर कुछ जमीन पट्टे आदि पर मिल भी गई तो वह केवल भूखों मरने से बचाने तक सीमित रही। उससे ठीक तरह गुजारा करना भी संभव नहीं होता था। दूसरे, नौकरियां जो मिलीं वे अधिकांश निम्न श्रेणी की या चतुर्थ श्रेणी की ही मिली हैं। उनमें कोई एससी-एसटी जमींदार बन गया हो, ऐसा उदाहरण शायद ही कोई दे सके। तीसरे, यदि कोई ठीक-ठाक पद तक पहुंच भी गया तो उसकी उपेक्षा की जाती है या फिर इतना काम लाद देंगे कि वह संभाल ही न सके। ऐसा केवल यह सिद्ध करने के लिए कि देखो, आरक्षण के चलते एक अयोग्य व्यक्ति का चयन हो गया और प्रतिभाएं घर पर मर रही हैं!

लगता है, केंद्र सरकार का तो छद््म अभियान ही है आरक्षण समाप्ति का, अधिकाधिक निजीकरण, न्यूनतम आरक्षण! यदि संविधान पीठ को ऐसा कोई फैसला करना ही है तो शुरू से लेकर अब तक का हिसाब सरकार से ले कि क्या आरक्षण का पूरा लाभ इसके हकदारों को दिया गया है? कई संस्थाएं आरक्षण संबंधी प्रावधानों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करती रहती हैं, उनका संज्ञान लेना भी आवश्यक है।
’अजय कुमार अजेय, करावल नगर, दिल्ली

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