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इस तरह जोड़-तोड़ की राजनीति करके बिहार में सरकार बना लेना जनता के साथ धोखा नहीं है?

वर्तमान समय में सभी दलों के नेता, कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होने की जल्दबाजी में दिखाई दे रहे हैं।
Author August 2, 2017 06:05 am
कैबिनेट विस्‍तार के दौरान बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार व उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी। (Source: PTI)

भरोसे को धोखा
आए दिन नए-नए सरकारी फैसलों ने आम लोगों से लेकर मध्यवर्ग की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एक करोड़ से कम जमा राशि वाले खातों पर मिलने वाली ब्याज को कम करना और रसोई गैस के दामों में प्रतिमाह बढ़ोतरी ने महंगाई के दौर में आम आदमी को सोचने पर विवश कर दिया है। आम आदमी की रीढ़ समझे जाने वाली एफडी पर ब्याज की दरें सरकार पहले ही कम कर चुकी है।
2014 में जब जनता ने इस सरकार को चुना तब उन्हें इससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन अब उन पर पानी फिरता नजर आ रहा है। न तो महंगाई कम हुई है और न कालाबाजारी रुकी है। ऊपर से तमाम योजनाओं के चलते न सिर्फ जनता को परेशान होना पड़ा है, बल्कि बेरोजगारी में भी बढ़ोतरी हुई है। मुद्दे सिरे से गायब हैं और उनका स्थान गैर-जरूरी बहसों ने ले लिया है। अभी सरकार का रवैया जिस तरह का है, उससे लगने लगा है कि आने वाले समय में आम लोगों की मुसीबतें और बढ़ने वाली हैं।
’कन्हैया लाल, जामिया मिल्लिआ, नई दिल्ली
ताक पर नैतिकता
वर्तमान समय में सभी दलों के नेता, कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होने की जल्दबाजी में दिखाई दे रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का खौफ इस कदर बढ़ गया है कि कांग्रेस जैसी दिग्गज पार्टी को अपने विधायकों को बेंगलुरु में छिपाने की खबरें आर्इं। बिहार में एक बड़े उथल-पुथल के बाद एनडीए की सरकार बनने के बाद भाजपा के हौसले बुलंद हैं। लेकिन यह सच है कि बिहार चुनाव में आम जनता ने वोट भाजपा के विरुद्ध और महागठबंधन के पक्ष में दिया था।
तो क्या इस तरह जोड़-तोड़ की राजनीति करके बिहार में सरकार बना लेना जनता के साथ धोखा नहीं है? क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं है। भाजपा जैसी पार्टी जो राजनीतिक शुचिता का दावा करती रही है, क्या उसे सत्ता पाने के लिए जोड़-तोड़ की राजनीति करने की जरूरत आन पड़ी है?
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद
सुविधा की नजर
अपने लेख (30 जुलाई) में तवलीन सिंह भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ राजनेताओं और सांसदों को उत्तरदायी ठहराती हैं, लेकिन नौकरशाही के साथ-साथ कुछ अन्य समूहों को बख्श देती हैं। अगर सिर्फ विधायिका के लोग भ्रष्ट हैं तो क्या हम यह मान लें कि कार्यपालिका और न्यायपालिका से जुड़े लोग ही पूरी तरह ईमानदार हैं? दरअसल, हमारे समाज के रग-रग में भ्रष्टाचार समा गया है। लेकिन कोई भी अपने भीतर या अपने समर्थक तबकों के भीतर फैले भ्रष्टाचार को नहीं देखना चाहता।
’मिलिंद रोंघे, महर्षि नगर, इटारसी

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