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चौपाल: नैसर्गिक अधिकार

मनुष्य धरती के करोड़ों-अरबों सजीव व निर्जीव चरों में से एक है और हमें इसका कोई अधिकार नहीं कि हम इनके साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार करें।

Author September 20, 2016 12:47 AM
जंगल (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कानून क्या जन भावनाओं से ऊपर उठ कर अपना काम कर सकता है? यह सवाल मन-मस्तिष्क को कई बार झकझोर देता है और फिर इस बिंदु पर आकर ठहर जाता है कि उसकी निर्मिति किसके द्वारा हुई है? कानून जन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता ही है और शायद यही कारण है कि हिंदुस्तान और अफगानिस्तान के कानूनों में जमीन-आसमान का अंतर पाया जा सकता है। खैर, मेरे दृष्टिकोण से कानून बनाना एक ऐसा काम है जिसके लिए मनुष्य को मनुष्यता से भी ऊपर उठ कर काम करना पड़ सकता है; उसे धरती के एक सामान्य प्राणी के रूप में धरती, पर्यावरण और अन्य जीवों के प्रति समदर्शी होते हुए अपने कार्य को अंजाम देने की जरूरत होती है। हिंदुत्व, इस्लाम या अन्य कोई सांप्रदायिक अथवा क्षेत्रीयता आधारित वर्चस्व जब कानून में निहित नैसर्गिक न्याय की सत्ता को चुनौती देता हुआ उसे बुरी तरह प्रभावित करने लग जाता है तो ऐसे में कानून अपना महत्त्व खो बैठता है।

कानून के निर्माण और पालन के अनंतर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य धरती के करोड़ों-अरबों सजीव व निर्जीव चरों में से एक है और हमें इसका कोई अधिकार नहीं कि हम इनके साथ क्रूरतापूर्वक व्यवहार करें। पृथ्वी को विकृत करने और इसकी स्वाभाविक व्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित करने में हमने संभवत: कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। हमारे निन्यानवे फीसद कानून हमें विशाल प्राणी व पादप जाति के शीर्ष पर सम्राट की भांति सुशोभित करते हैं। हमने उन्हें एक ‘निश्चित मूल्य’ वाली वस्तु में बदल दिया है। हमने राष्ट्रों की सीमाएं तक तय कीं। समुद्र और जमीन पर फैले विशाल प्राणी व पादप समूह की खरीद-फरोख्त तथा मनमाने प्रयोग के तरीके विकसित किए। गाय से लेकर मछलियों और केकड़ों तक, समंदर के किनारों से लेकर पर्वतों की घाटियों तक सब आज उनकी अपनी इच्छा के विपरीत मनुष्य की मुद्रा और व्यापार का हिस्सा हैं।

नदियों को बांधने से पहले हम न तो नदी के बारे में सोचते हैं और न ही उसके प्रवाह पर आश्रित करोड़ों-अरबों जीवों के बारे में। पेड़ और जंगल काटते हुए हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता कि हम कितने पक्षियों और जीवों का भोजन और आश्रय उजाड़ रहे हैं। यह दूसरों के नैसर्गिक अधिकार का क्रूर नकार है। हम मनुष्य आज पृथ्वी के क्रूरतम और मूर्ख शासक की भांति विराजमान हैं और समूची प्रकृति व समूचा जीव जगत हमारे कदमों में दया का पात्र बना जंजीरों में जकड़ा पड़ा है। यह स्थिति जिस दिन भी पलटेगी वह मनुष्य जाति के सर्वनाश का दिन होगा।
’घनश्याम कुमार ‘देवांश’, नई दिल्ली

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