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विक्षिप्तों की सुध

इलाज के लिए पैसों की कमी, पारिवारिक कलह, असुरक्षा या जानबूझ कर जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर छोड़ देते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर भटकते ये विक्षिप्त जन कभी-कभी हिंसक भी हो जाते हैं

Author July 3, 2017 7:11 AM
प्रतीकात्मक चित्र

बस अड््डे, बाजार, रेलवे स्टेशन आदि स्थानों पर अक्सर हमें मैले-कुचैले कपड़ों या बिना कपड़ों के इधर-उधर घूमते या बैठे विभिन्न आयु वर्ग के विक्षिप्त स्त्री या पुरुष दिखाई दे जाते हैं। इनमें स्वयं घर छोड़ कर निकल गए लोगों के साथ ही साथ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें उनके परिजन विभिन्न कारणों मसलन, इलाज के लिए पैसों की कमी, पारिवारिक कलह, असुरक्षा या जानबूझ कर जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए सार्वजनिक स्थलों पर छोड़ देते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर भटकते ये विक्षिप्त जन कभी-कभी हिंसक भी हो जाते हैं जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके अतिरिक्त ये स्वयं भी हर समय खतरे में जी रहे होते हैं। इनके बीमार या दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका हमेशा रहती है। विशेष रूप सेविक्षिप्त महिलाओं के लिए तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है।

असामाजिक तत्त्वों द्वारा इन महिलाओं को यौनहिंसा की शिकार बनाए जाने और परिणामस्वरूप उनके गर्भवती हो जाने की खबरें भी समाचार पत्रों आती हैं। ऐसी ही एक महिला के गर्भपात करने की अनुमति मांगे जाने का मामला हाल ही में न्यायपालिका की चौखट पर पहुंचा था लेकिन प्रक्रियागत विलंब के कारण समय रहते अनुमति नहीं मिल सकी। यह स्थिति और भी अधिक शोचनीय व पीड़ादायक है। असुरक्षित विचरण कर रहे ऐसे विक्षिप्त जनों के प्रति प्राथमिक दायित्व निकटतम थाने का होता है, जिस पर अपने क्षेत्राधिकार में घूमते विक्षिप्तों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी होती है ताकि उन्हें सक्षम न्यायालय के आदेश पर समुचित चिकित्सकीय जांच के बाद पुनर्वास केंद्र भेजा जा सके। लेकिन थाने के प्रभारी संसाधनों की कमी का रोना रोते पाए जाते हैं। किसी तरह न्यायालय तक पहुंच गए मामलों को पुनर्वास केंद्र तक पहुंचाने में भी बहुत-सी व्यावहारिक दिक्कतें गिनाई जाती हैं। लिहाजा, विक्षिप्त जनों के समुचित उपचार के संबंध में बने नियमों के पालन में जो भी व्यावहारिक समस्याएं आती हैं उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। समाज के तथाकथित जिम्मेदार लोगों को भी आगे आना होगा। सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को केवल फोटो लेने, प्रेस विज्ञप्ति, सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रखना कतई सही नहीं है। यह भी उचित नहीं कि हम ऐसे विक्षिप्त जनों को महज खाना-कपड़ा देकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ कर अपनी शेष जिम्मेदारी के मुंह मोड़ लें।

विक्षिप्त जनों के साधन-संपन्न परिजनों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। नए उच्चस्तरीय चिकित्सालयों और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना के साथ मौजूदा केंद्रों की व्यवस्था सुधारे जाने की जरूरत है। इनके सुचारु संचालन के लिए उच्च प्रशिक्षित चिकित्सकों और कर्मचारियों की तैनाती करनी होगी, रिक्त पदों को भरना होगा, कारगर औषधियों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विक्षिप्त जनों को भी संविधान से उतने ही अधिकार प्राप्त हैं जितने किसी भी भारतीय नागरिक को मिलते हैं। लिहाजा, उन्हें भी स्वस्थ और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दिलाए जाने की समुचित व्यवस्था करनी ही होगी।
’ऋषभ देव पांडेय, कोरबा, छत्तीसगढ़
सलाहुद्दीन पर शिकंजा
आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन को अमेरिकी प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करार देना पाक के मुंह पर करारा तमाचा है। अमेरिका का यह कदम इस बात को भी मजबूती से रेखांकित करता है कि दोनों देश आतंकवाद के खतरे का सामना करते हैं और भारतीय हित अमेरिका की प्राथमिकता में शामिल हैं। सलाहुद्दीन कश्मीर घाटी में सैकड़ों आतंकी वारदातों का मुजरिम है। सितंबर 2016 में इस शख्स ने कश्मीर मुद्दे के किसी भी शांतिपूर्ण समाधान को बाधित करने और घाटी को भारतीय बलों की कब्रगाह बनाने की कसम भी खाई थी।

अब सलाहुद्दीन को ग्लोबल आतंकी घोषित किए जाने के बाद निश्चित तौर पर पड़ोसी मुल्क की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। आतंकियों की शरणस्थली के रूप में दुनिया के सामने पाक का नापाक चेहरा बेनकाब होगा। जाहिर तौर पर भारत की यह बड़ी जीत है।
’नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर

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