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चौपाल- आगे की राह, दिलासे का पर्दा

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि अठारह वर्ष से कम उम्र की पत्नी से भी शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आएगा, स्त्री स्वतंत्रता की दिशा में एक और कदम है।

Author October 16, 2017 5:05 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि अठारह वर्ष से कम उम्र की पत्नी से भी शारीरिक संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आएगा, स्त्री स्वतंत्रता की दिशा में एक और कदम है। दरअसल, इस फैसले से स्त्री सशक्तीकरण को बल मिलेगा। एक समय था जब सती प्रथा की त्रासदी हमारे पितृसत्तात्मक समाज में व्याप्त थी। कानून और सामाजिक जागरूकता के कारण ही आज ‘सती प्रथा’ शब्द इतिहास की कुरीति के रूप में दफन हो गया है। उसी तरह बाल विवाह के खतरे से अदालत अगर आगाह कर रही है तो सामाजिक रूप से भी लोगों को अब सक्रियता दिखानी होगी।

सबसे बड़ी बात है कि विविधता से भरे विशाल भारत में जहां अभी दो करोड़ बाल वधुएं हैं, अठारह वर्ष से पहले लाखों लड़कियों की शादी हो जाती हो, इकतीस प्रतिशत लड़कियों की शादी अठारह वर्ष से पहले ही कर दी जाती हो, दब कर जीने की आदत हो, ऐसे में झटके से बाल विवाह खत्म हो जाएंगे, फिलहाल एक अच्छी कल्पना है। लेकिन बिना इसे सुनिश्चित किए हम सामाजिक रूप से आगे बढ़ने का दावा नहीं कर सकते।बाल विवाह के दुष्परिणाम से बचने से निश्चय ही लाखों माताओं और बच्चों का जीवन सुरक्षित हो जाएगा, क्योंकि चिकित्सक यही मानते हैं कि कम उम्र मे मां बनने के बहुत नुकसान होते हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि वर्तमान में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है जो अठारह और इक्कीस वर्ष क्या, तीस वर्ष में भी शादी करना नहीं चाहते। इससे एक नई जटिलता खड़ी हो रही है। दूसरी ओर, कुछ लोग गरीबी के कारण अपनी बेटी की शादी कम उम्र में कर देते हैं। इस तरह की व्यवस्था से कुल मिलाकर न केवल लड़कियों को, बल्कि पुरुष वर्ग को भी फायदा होगा।
’मिथिलेश कुमार, भागलपुर, बिहार
दिलासे का पर्दा
हाल ही में खबर आई कि मुंबई में एक पुल पर मची भगदड़ के जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी। गोरखपुर के एक अस्पताल में बड़ी तादाद में बच्चों के मरने पर भी कार्रवाई का दिलासा दिया गया है। बाकी हादसों के दोषियों पर भी कार्रवाई का भरोसा दिलाने की रस्म निबाही जाएगी। दरअसल, जब कोई बड़ी घटना हो जाती है और उससे सरकार की छवि गिरने लगती है तो कार्रवाई का भरोसा दिलाने वाली खबरें भी आने लगती हैं। लेकिन इस तरह की खानापूर्ति से क्या होता है! स्थायी हल के लिए क्या किया जाता है? भारत में रोज होने वाली सैकड़ों मौतों या तमाम घोटालों, आपराधिक घटनाओं के जिम्मेदार चेहरे को दुनिया के सामने पेश कर दिया जाता है। जनता भी बड़ी आसानी से यह सोच लेती है कि दोषी व्यक्ति को सजा मिली।
लेकिन क्या वास्तव में असली दोषियों को कठघरे में खड़ा किया जा पाता है? आखिर कुछ ही दिनों बाद फिर वैसी ही घटना क्यों हो जाती है? कुछ समय पहले उत्तराखंड में मानव अंगों की तस्करी करने वाला एक गिरोह सामने आया। गिरोह के कथित सरगना को पकड़ा गया। शायद उसे सजा भी मिलेगी। लेकिन क्या यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इस घटना के बाद मानव या अंगों की तस्करी न हो? शायद नहीं। ऐसी घटनाएं एक लचर व्यवस्था का नतीजा होती हैं। लेकिन शायद ही कोई ऐसी ठोस पहल होती है जिससे समूची व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव हो। क्या ऐसा इसलिए होता है कि इस तरह के अपराधों के शिकार आमतौर समाज के कमजोर तबके के लोग होते हैं?
’आशुतोष शुक्ल, इलाहाबाद

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