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चौपाल: देश की बात

‘मन की बात’ निस्संदेह एक सही और प्रभावी मंच है जहां प्रधानमंत्री कुछ बदले लहजे में, थोड़ा नीचे उतर कर देशवासियों से रूबरू होते हैं

Author Published on: September 28, 2016 4:54 AM
पीएम मोदी (file photo)

पिछले कुछ समय से, कहें कि कश्मीर की बिगड़ती स्थिति के साथ ही भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में हमेशा से मौजूद दरारें एक बार फिर उघड़ने लगीं। उड़ी की त्रासदी से एक सच का भयावह चेहरा फिर नकाब से झांका। देश के हर कोने से आवाजें उठीं कि इस दुर्दांत पड़ोसी को करारा सबक सिखाने का यही मौका है और किसी भी कीमत पर इस मौके को हाथ से न निकलने दिया जाए। पर इतिहास साक्षी है कि यह कीमत तो किसी भी हद तक पहुंच सकती है, लहू की नदियों तक, रुदन और चीत्कार तक, पीढ़ियों तक पीछा करती शारीरिक-मानसिक यंत्रणाओं तक। इसलिए जो भी हो, युद्ध टल जाने के संकेत सुखद हैं।

चौबीस सितंबर को कोझिकोड में प्रधानमंत्रीजी के भाषण को लेकर देश के बहुसंख्यक लोग नाराज भी दिखे कि उन्होंने अपने रुख में नरमी क्यों दिखाई? मेरे जैसे बहुत सारे लोगों को तो इसमें गरमी ही ज्यादा दिखाई दी। पता नहीं उनके इस ललकार भरे वक्तव्य को ‘संयम की नीति’ किस आधार पर कहा गया (संपादकीय, 26 सितंबर)। देश का मुखिया दूसरे देश की सरकार की कुटिल नीतियों पर भड़ास निकाल सकता है। अगर उसका अपना देश इससे प्रभावित होता है तब तो उसे इस बात का पूरा हक है। पर सरेआम किसी देश की अवाम से उनकी सरकार के खिलाफ कोई भड़काऊ अपील करना एक निहायत गैरजिम्मेदाराना और अनधिकृत बयान है। पड़ोसी के घर में चिंगारी फेंकेंगे तो क्या अपने घर को आग की लपटों से बचा सकेंगे? दूसरों के गिरेबान में झांकने की बजाय अपने हालात की समीक्षा करके समस्या के हल जुटाए जाने चाहिए। आखिर आपको भी तो दूसरे से यही शिकायत रहती है!

‘मन की बात’ निस्संदेह एक सही और प्रभावी मंच है जहां प्रधानमंत्री कुछ बदले लहजे में, थोड़ा नीचे उतर कर देशवासियों से रूबरू होते हैं। मेरा विचार है कि इस कार्यक्रम का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। देश की चुनिंदा शख्सियतों को, जिनके पास ज्ञान और अनुभव की अमोल संपदा हो, समय-समय इसमें आमंत्रित किया जा सकता है। अपने इस देश के पटल पर शोर और चमक-दमक से परे कुछ धूमिल, गुमनाम या कम मुखर छवियां भी मौजूद होंगी, मन की गागर में सागर को समोए हुए। बहुत अच्छा हो अगर प्रधानमंत्रीजी के साथ-साथ कुछ और लोगों के मन की बात भी देश की जनता तक पहुंच सके।
’शोभना विज, पटियाला

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