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चौपाल: अमन की राह

एक तरफ तो दोनों देश दुश्मन हैं लेकिन इस मुद्दे पर सगे भाई लगते हैं।

Author नई दिल्ली | September 12, 2016 6:48 AM
कश्मीर घाटी में पत्थर फेंकते लोग। (फाइल फोटो)

कश्मीर और बलूचिस्तान दोनों आजादी की मांग कर रहे हैं। एक भारत से तो दूसरा पाकिस्तान से। कश्मीर को तो सब जानते हैं लेकिन बलूचिस्तान के बारे में जान लेना चाहिए कि यह पाकिस्तान का हिस्सा है जैसे कश्मीर हमारा। दोनों तरफ के लोग अपने यहां की सरकार के विरोध में खड़े हो गए हैं। हम या वे, दोनों में से एक को सही मानते हैं और दूसरे को गलत। ऐसा क्यों? कश्मीर की आजादी गलत है तो क्या बलूचिस्तान की आजादी सही है? हम बस कश्मीर देख रहे हैं कश्मीरियों को नहीं, वे भी केवल बलूचिस्तान देख रहे हैं बलूचों को नहीं।
सवाल है, आखिर यह विरोध क्यों हो रहा है? बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों से भरा हुआ है, जिनमें तेल, कोयला, सोना आदि शामिल हैं। इनका दोहन सरकार करना चाहती है। इस दोहन में लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं। इसी की वजह से वह एक संगठन बना जो सरकार से युद्ध लड़ रहा है।

इसी युद्ध और अत्याचार से परेशान होकर आज वहां के लोग आजादी की मांग कर रहे हैं। 2003 से सीमा की सुरक्षा के नाम पर वहां सब कुछ जायज दिखाया जा रहा है, न जाने कितने लोग मारे जा चुके हैं, हालात वहां बेहद खराब होते जा रहे हैं।कश्मीर में भी हालात 1970 के बाद ज्यादा बिगड़ने लगे। 1987 में वहां के लोगों के साथ लोकतंत्र की धोखाधड़ी हुई (उस समय चुनाव में एक घपला हुआ था), काफी समय तक चुनाव नहीं हुए, इस बीच लोगों का विरोध बढ़ता गया। बदले हालात में सेना वहां ठहर-सी गई। फिर 1990 के बाद अफस्पा लगा जो आज तक कायम है।

एक तरफ तो दोनों देश दुश्मन हैं लेकिन इस मुद्दे पर सगे भाई लगते हैं। दोनों शांति का दिखावा करके हिंसा का खेल खेल रहे हैं? एक तरफ तो हम संसदीय दल भेजते हैं और दूसरी तरफ एक नए हथियार की बात करते हैं कश्मीर के लिए! क्या बस हथियार आखिरी रास्ता बच गया है? कश्मीर हो या बलूचिस्तान, दोनों तरफ आम नागरिक परेशान हैं। लगता है, अब सरकार के पास बंदूक के अलावा कोई हल नहीं बचा है, जबकि हमें शांति का कोई रास्ता खोजना होगा। रास्ता सच्चा होना चाहिए, दिखावे का नहीं।
-अभय, दिल्ली

 

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