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चौपाल- पीड़ा का परिदृश्य, विवाद और संवाद

जेएनयू के छात्रों और अध्यापकों की पिछले एकवर्ष से आरंभ हुई संघर्ष-यात्रा इस समय अपने चरम पर पहुंच चुकी है।

Author March 1, 2017 7:10 AM
जेएनयू विश्वविद्यालय (express File Pic)

पीड़ा का परिदृश्य

जेएनयू के छात्रों और अध्यापक ों क ी पिछले एकवर्ष से आरंभ हुई संघर्ष-यात्रा इस समय अपनेचरम पर पहुंच चुक ी है। चार महीने पहले अमानवीयतरीके से नजीब क ो गायब क र दिए जाने के बाद सेजेएनयू के प्रांगण में दर्द और आक्र ोश के जो परिदृश्यउभरे हैं, उनक ी निरंतर गहराती हुई परछाइयां अब एकक ाले धुएं क ा रू प ले चुक ी हैं। इन दिनों सोशलमीडिया जेएनयू के भीतरी घटनाचक्र क ो हर स्तर परसामने ला रहा है और इस विक राल सच से रू बरूहोना अपने आप में एक यंत्रणा है। जवाहरलाल नेहरूविश्वविद्यालय प्रगतिशील सोच क ो प्रोत्साहित क रनेवाला देश क ा सुप्रतिष्ठित संस्थान है, जिसमें देश केक ोने-क ोने से युवा उच्च अध्ययन के लिए आते हैं।आज इन युवाओं क ो एक विक ट स्थिति में पाक र हमजहां आहत महसूस क र रहे हैं, वहीं इनक ी बौद्धिकक्षमताओं और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंदक रने के इनके साहस से अभिभूत भी हैं। एक जुटहोक र हमारे ये बच्चे देश क ी फि जा में मंडरा रही उसतानाशाही से जूझ रहे हैं जो आज इन्हें इनकेअध्ययन-क क्षों से निक ाल क र बाहर सड़क पर खींचलाई है। इससे पहले इस विश्वविद्यालय क ी दीवारों नेऐसा मंजर शायद क भी नहीं देखा होगा!

जेएनयू के सुयोग्य अध्यापक -गण इस संघर्ष-यात्रामें जिस तरह अपने विद्यार्थियों क ा मार्गदर्शन क र रहे हैंऔर देश के अनेक महान चिंतक , राजनेता औरबुद्धिजीवी यहां पहुंच क र, व्याख्यानों के जरिए जिसतरह उनके सहयात्री बने हुए हैं, उससे हमारे इसविश्वास क ो बल मिलता है कि जेएनयू के युवा इस जंगक ो जीतेंगे, अवश्य जीतेंगे! रहा सवाल नजीब क ो वापसलाने में उनके क ामयाब होने क ा, यह इबारत तो उसदीवार के पीछे क हीं लिखी हो सक ती है जिस दीवार सेये सत्याग्रही युवा टक राने जा रहे हैं। नजीब क ी अम्मीके माध्यम से रोहित वेमुला क ी मां, और भी न जानेकि तनी मांओं क ा दर्द जेएनयू के प्रांगण में साक ार हुआलग रहा है। जेएनयू के छात्रों ने इस बहुव्यापी पीड़ा क ोलेक र सत्ता क ो झक झोरने में एक सक ारात्मक पहल क ीहै। उनक ा आंदोलन सही अर्थों में आंदोलन है, इसलिएकि इसमें आंदोलन क ी गरिमा के दर्शन होते हैं, जो इसमहान शिक्षा-संस्थान क ी छवि के अनुरू प है।अहम बात यह भी है कि इस लड़ाई में इनयुवाओं क ो देश के बहुत सारे संस्थानों के छात्रों औरअध्यापक ों क ा भरपूर समर्थन मिल रहा है। हमचाहते हैं कि समर्थन और सहयोग क ा एक राष्ट्रव्यापीसिलसिला चले। ‘मिले सुर मेरा-तुम्हारा, तो सुरबने हमारा।’ एक जुटता क ा दायरा फै लता चलाजाए। अध्यापन-क ार्य से सेवानिवृत्त हो चुके हमजैसे हजारों-लाखों लोग जेएनयू के छात्रों क ीक ठिनाइयों और बाधाओं से भरी इस संघर्ष-यात्रामें उनके सफ ल होने क ी क ामना क रते हैं।

शोभना विज, पटियाला

विवाद और संवाद

कहा जाता है कि जापान में जब क र्मचारियों को अपना विरोध जताना होता है तो वे उत्पादन बढ़ा देते हैं।इससे ऊपर बैठे लोगों के पास उनका संदेश पहुंच जाताहै। लेकि न खुद क ो विश्वगुरु बनाने क ा सपना देखनेवाले भारतीय इस मामले में पाषाणक ाल से ताल्लुकरखते हैं। रामजस क ॉलेज में उमर खालिद के प्रक रण क ोलेक र जितनी हायतौबा मची उससे साबित होता है किविरोध के मामले में हमें परिपक्व होने क ी जरू रत है।गुरमेहर क ौर क ो लेक र जिस तरह बातें क ी जा रहीहैं उनक ा समर्थन भी नहीं कि या जा सक ता। बेहतरहोता कि जिस आयोजन क ो लेक र बखेडा खड़ा कि यागया है उसे होने दिया जाता और वहां तकर् ों के साथअपना विरोध दर्ज क राया जाता। दुख क ी बात है किऐसा नहीं हुआ। आजक ल विरोध के लिए संवाद क ीबजाय विवाद क ा सहारा लिया जाता है। इस संस्कृ ति क ो बदलने क ी जरू रत है।

 

वीरेन्द्र सहवाग ने गुरमेहर कौर से जुड़े सवालों को किया नजरअंदाज

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