ताज़ा खबर
 

चीनी चाल

चीन इस परियोजना में लगभग आठ लाख करोड़ का एक बड़ा निवेश करने जा रहा है जो सभी देशों की आधारभूत संरचना के विकास में सहायक सिद्ध होगा।

Author Published on: May 25, 2017 5:35 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग। (फाइल फोटो)

चीनी चाल

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग की महत्त्वाकांक्षी परियोजना है जिसका उद्देश्य चीन को अंतरराष्ट्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना है। इसके दम पर चीन खुद को अमेरिका के बराबर या कहें कि उससे भी आगे ले जाना चाहता है। इस परियोजना का मकसद रेलवे, बंदरगाहों, राजमार्गों और पाइपलाइन के एक नेटवर्क के जरिए एशिया, अफ्रीका और यूरोप में संपर्क बढ़ाना और व्यापार में नई जान डालना है। चीन की इस परियोजना का उद्देश्य न सिर्फ आर्थिक है बल्कि कई मायनों में यह सामरिक भी है। इस परियोजना के जरिए वह लगभग समूचे एशिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। इसके तहत चीन एशिया व अफ्रीका के गरीब देशों में मुफ्त निवेश नहीं करेगा बल्कि उन्हें ऋण देगा जिससे वे श्रीलंका की तरह चीन के ऋणजाल में फंस जाएंगे। तब न सिर्फ वह अपने सामान को उन देशों में भर देगा बल्कि उन देशों की नीतियां भी प्रभावित करेगा। चीन इस परियोजना से अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी साध रहा है। अरब के देशों से ग्वादर बंदरगाह के जरिये बहुत आसानी से तेल की जरूरतों को कम समय व कम खर्च में पूरा कर लेगा और साथ ही चीन को अपने माल की खपत के लिए एक बड़ा बाजार भी मिलेगा।

चीन इस परियोजना में लगभग आठ लाख करोड़ का एक बड़ा निवेश करने जा रहा है जो सभी देशों की आधारभूत संरचना के विकास में सहायक सिद्ध होगा। लेकिन जिन देशों में अपने पैसे का ऋण के रूप में निवेश करेगा उन देशों की क्रेडिट रेटिंग भी उतनी अच्छी नहीं है या वे इस हालत में नहीं हैं कि चीन का पैसा सूद समेत वापस कर पाएंगे। कई वित्तीय संगठन इस बाबत चेता भी चुके हैं। इसके बावजूद चीन अगर इतना बड़ा निवेश कर रहा है तो इसके पीछे उसकी सोची-समझी रणनीति है। भारत के पड़ोसी देशों को 14-15 मई को बीजिंग में वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) इनिशिएटिव पर दो दिवसीय सम्मेलन में शामिल करा कर चीन ने भारत की चिंता बढ़ाई है। दरअसल, भारत और चीन के बीच तीन-चार महीनों से तनाव माहौल बना है। इसके लिए कई बातें जिम्मेवार हैं। मसलन, जैश-ए-मुहम्मद के सरगना और कुख्यात आतंकी मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने में चीन का अड़ंगे लगाना, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश का विरोध करना, दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश दौरे का विरोध करना, अरुणाचल के छह जिलों का नामकरण करना, आदि। इसलिए भारत का ओबीओआर इनिशिएटिव सम्मेलन में भाग न लेने का निर्णय बिलकुल सही प्रतीत होता है।

वैसे आज के दौर में भारत को नजरअंदाज या अलग-थलग करना उतना आसान नहीं है। भारत ने इस सम्मेलन में भाग न लेकर संपूर्ण विश्व को अपनी चिंताओं से अवगत कराया है। एक ठोस तथ्य यह भी है कि जब तक भारत ओबीओआर परियोजना में भागीदार नहीं बनता तब तक यह सही मायने में पूर्ण नहीं होगी क्योंकि भारत एक मजबूत लोकतांत्रिक देश, विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या है। भारत विश्व में एक सबसे बड़ा बाजार है, आईटी के मामले में सॉफ्टवेयर व सेवा प्रदान करने वाला बड़ा देश है जो विश्व में हमारी उपयोगिता को बताता है। निस्संदेह यह परियोजना भारत को विश्व के साथ जुड़ने का एक बड़ा अवसर प्रदान करती मगर भारत सरकार का अपनी संप्रभुता को सबसे ऊपर जगह देना चीन को भी सोचने के लिए मजबूर करेगा।
’कन्हैया पांडेय, रघुनाथपुर, बिहार
कड़ा संदेश
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता में कटौती करके उसे कड़ा संदेश दिया है। इधर भारत ने भी दस पाकिस्तानी चौकियां नेस्तनाबूद कर उसे गहरी चोट पहुंचाई है। कूटनीति के मोर्चे पर वह भारत से पहले भी कई बात मात खा चुका है। कुलभूषण मामले में दुनिया भर में उसकी किरकिरी हो चुकी है। अगर वह अब भी नहीं सुधरा तो जल्दी ही दुनिया में एक आतंकी देश के तौर पर पहचाना जाएगा।
’महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर

टॉप 5 हेडलाइंस: मीसा भारती गिरफ्तार,सहारनपुर में फिर हिंसा और भी खबरें

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 ईरान की अहमियत
2 ईमानदारी का जोखिम
3 छेड़खानी का रास्ता
ये पढ़ा क्या?
X