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असंगत तुलना

चीन में थ्येन आन मन चौक में पचास हजार युवाओं की हत्या भी कोई राजनीतिक बदलाव का कारण नहीं बनती जबकि हमारे यहां हजार दोषों के बावजूद एक संवेदनशील लोकतांत्रिक शासन है

Author Updated: September 19, 2017 7:06 AM
9वें ब्रिक्स सम्मेलन में पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग।

बुजुर्गों की सुध
हाल ही में असम विधानसभा ने एक अहम विधेयक पास किया है। इसके मुताबिक अपने माता-पिता और दिव्यांग भाई-बहनों की सही तरीके से देखभाल न करने वाले सरकारी कर्मचारियों के वेतन से दस फीसद राशि काटी जाएगी और यह राशि उसके माता-पिता या दिव्यांग भाई-बहन को दी जाएगी। सरकार का यह कदम सराहनीय होने के साथ ही समाज के उन तथाकथित सभ्य लोगों के मुंह पर करारा तमाचा भी है जो अपने माता-पिता को उनके बुढ़ापे के साथ अकेला और अभावों मेंं छोड़ देते हैं। यह अफसोसनाक है कि अपने बच्चों की खुशी के लिए पूरी जिंदगी लगा देने वाले माता-पिता को बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं मिल पाता। पढ़े-लिखे बच्चे उन्हें बोझ समझते हैं और उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखा देते हैं।
’कनिका कृष्ण, आईआईएमसी, दिल्ली
असंगत तुलना
अभिषेक ठाकुर ‘तर्क या तुर्रा’ (चौपाल, 15 सितंबर) में नेहरूजी की गरीबी और भुखमरी से लड़ने की प्राथमिकता पर सवाल उठाते हैं तो यह उनकी समझ और संवेदना है और उस पर सवाल नहीं किया जा सकता। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब वे इस मसले पर चर्चा करते हुए चीन से तुलना करते हैं और कहते हैं, ‘लिहाजा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के झंझट में पड़ने की भारत को जरूरत नहीं है।’ पहली बात तो यह कि इस तथ्य का बुलेट ट्रेन से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है क्योंकि जिस जापान की मदद से हम बुलेट ट्रेन बनाने जा रहे हैं वह भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। दूसरी बात, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 में हुई थी और भारत उसका प्रारंभिक सदस्य था लेकिन स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था। लिहाजा, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की बात बेमानी है।

अर्थव्यवस्था के हर पहलू पर भारत की चीन से तुलना करके भारत की हीनता को उघाड़ना आजकल फैशन-सा हो गया है और इस बात की बिल्कुल अनदेखी कर दी जाती है कि इन देशों की राजनीतिक व्यवस्था बिल्कुल जुदा है। चीन में थ्येन आन मन चौक में पचास हजार युवाओं की हत्या भी कोई राजनीतिक बदलाव का कारण नहीं बनती जबकि हमारे यहां हजार दोषों के बावजूद एक संवेदनशील लोकतांत्रिक शासन है और जब संवेदनशीलता में कमी होती है तो प्रबल प्रतिरोध होता है।अब जापान की बात। जापान पहले से ही भारत से अधिक विकसित रहा है और उसकी समस्याएं और प्राथमिकताएं निश्चित ही भारत से अलग रही हैं। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान की रक्षा संबंधी जिम्मेदारियां अमेरिका की थीं इसलिए इस ओर से जापान निश्चिंत था।
’आनंद मालवीय, इलाहाबाद

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