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नंबर एक

मुसलिम बहुल सऊदी अरब में योग को खेल का दर्जा मिला है। योग का विरोध करने वाले भारत के कट्टरपंथी उस देश से स्वास्थ्य को तवज्जो देना सीखें।

Author Published on: November 16, 2017 5:53 AM
हजार और पांच सौ के पुराने नोट को सरकार ने बंद कर दिया है।

योग मार्ग
मुसलिम बहुल सऊदी अरब में योग को खेल का दर्जा मिला है। योग का विरोध करने वाले भारत के कट्टरपंथी उस देश से स्वास्थ्य को तवज्जो देना सीखें। कई बीमारियों से शरीर की रक्षा करने वाले योग को खेल का दर्जा देनातंदुरुस्त सऊदी अरब के निर्माण के लिए फायदेमंद ही साबित होगा। इंसान का शरीर जाति या धर्म नहीं जानता लेकिन भारत में कट्टरपंथी योग को लोगों तक पहुंचने नहीं दे रहे हैं। ऐसे लोगों के कारण स्वस्थ भारत के निर्माण में बाधा आ रही है। कट्टरपंथियों के विरोध को ठुकरा कर अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए योग के मार्ग पर चलने में भला क्या बुराई है!
’अर्पिता पाठक, रायगड, महाराष्ट्र

नंबर एक
भारत को यदि नंबर एक बनना है, अग्रणी राष्ट्रों की पंक्ति में आना है, तो हमें नंबर दो छोड़ना होगा। हमें, मतलब सभी भारतीयों, सरकारी तंत्र समेत सबको। काली अर्थव्यवस्था का देश पर लगा दाग मिटाना होगा। अपनी वास्तविक आय छुपाकर आयकर देने से बचने की कोशिश गैर-कानूनी है, अनैतिक है। 2015-16 में केवल 3.3 फीसद भारतीयों ने आयकर-विवरणी भरी। इसकी तुलना यदि अपने जैसे विकासशील देशों से ही करें तो शर्म आती है। 2015 में ब्राजील में 13.9 फीसद और दक्षिण अफ्रीका में 33.4 फीसद लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किए। विकसित देशों में यह आंकड़ा इस प्रकार है- अमेरिका 46.2 फीसद, ब्रिटेन 47.1 फीसद तथा कनाडा 84.1 फीसद। अन्यत्र भी ऐसे ही आंकड़े हैं। इस समय देश में ऐसी सरकार है, जो कठोर इच्छा शक्ति के साथ नंबर दो मिटाने के लिए आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाने का प्रयास कर रही है। इस काम में उसे कुछ सफलता भी हासिल हो रही है। इस प्रयास की निंदा-आलोचना-उपहास करने की जगह इसमें खुशी से सहभागिता करनी चाहिए। राष्ट्र-निर्माण का यही तकाजा है। चुनावी राजनीति को दूर रख कर सोचिए। आयकर राजस्व राष्ट्रीय सुरक्षा, राजमार्ग-निर्माण आदि विकास कार्यों में लगता है।
’अजय मित्तल, मेरठ

उपेक्षा का खेल
हमारी पुरानी आदत रही है कि गलतियों से सीखने के बजाय उन्हें दोहराते रहते हैं। बीते ओलंपिक में भारत बड़ी मशक्कत के बाद दो पदक जीत पाया था। उसके बाद मोदी सरकार ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए तमाम कदम उठाए लेकिन स्थिति आज भी वही है। तीन महीनों तक चले कबड्डी लीग का फाइनल अट्ठाईस अक्तूबर को चेन्नई में हुआ और पटना ने तीसरी बार गुजरात को हराकर अपनी बादशाहत कायम रखी।
मैच में रोमांच क्रिकेट से ज्यादा था लेकिन इस फाइनल को जितनी सुर्खियां मिलनी चाहिए थीं, नहीं मिलीं। सुर्खियां तो दूर, कुछ अखबारों ने इसकी खबर भी नहीं छापी। अगर आइपीएल में कोई खिलाड़ी शतक लगा दे तो वह अखबार के पहले पेज पर और टीवी चैनलों का मुख्य समाचार होता है। यह दोहरा बर्ताव नहीं तो क्या है! खेलप्रेमियों और मीडिया जगत से गुजारिश है सभी खेलों को बराबर महत्त्व दिया जाए तभी अपेक्षित परिणाम प्राप्त होंगे।
’आशीष पाल, दिल्ली

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