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चौपाल: पखवाड़े की हिंदी

हिंदी भाषा के अंदर उभरती प्रतिभाओं को निरंतर पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर हतोत्साहित किया जाता है।

Author September 20, 2016 1:11 AM
हिन्दी।

प्रेमपाल शर्मा ने ‘हिंदी में क्यों लिखूं’ (दुनिया मेरे आगे, 3 सितंबर) टिप्पणी में बाल मनोविज्ञान के अंदर झांकने का प्रयास किया है। आज शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है और इसके बरक्स ही समाज के चरित्र में भी बदलाव आ रहा है। ऐसे में बाल मन का अपनी भाषा के साहित्य के प्रति रुझान ‘बस पढ़ लेता हूं’ वाला रह गया है। यही वजह है कि हिंदी भाषा के अंदर उभरती प्रतिभाओं को निरंतर पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर हतोत्साहित किया जाता है।

वहीं, इसके विपरीत अंग्रेजी भाषा के प्रति विशेष आकर्षण देखने को मिलता है। यह आकर्षण अनायास ही नहीं है क्योंकि आज खाने-कमाने की भाषा अंग्रेजी तो है ही इसके साथ यह सत्ता की भी भाषा है। इस वजह से समाज में एक मानसिकता बनती चली जा रही है कि बच्चा अंग्रेजी नहीं जानेगा तो अपनी जिंदगी में कुछ नहीं कर सकता है। इस तरह से बाल मन के नैसर्गिक विकास को रोका जा रहा है। यह एक तरह की साजिश ही है। वैसे तो कोई दूसरी या विदेशी भाषा सीखना कोई बुरी बात नहीं है, पर यही सब कुछ बन जाए, यह गलत है।

हमारे बचपन का विकास मातृभाषा में ही होता है क्योंकि इससे किसी व्यक्ति के अंदर की सृजनात्मक शक्ति ज्यादा मजबूती के साथ उभर कर सामने आती है। लेकिन इसे हम सामाजिक-सांस्कृतिक विडंबना कहें या साजिश, जहां से चल कर हमारे मन-मस्तिष्क का विकास संभव है, उसे ही हम नकारने का प्रयास कर रहे हैं। संभावनाओं के इस दौर में ‘हिंदी’ सिर्फ एक भाषा नहीं हमारे जीवन जीने की एक शैली है। इसे क्या हम सितंबर के हिंदी पखवाड़े तक सीमित रखेंगे या फिर इसकी धारा को अपने जीवन के हर क्षेत्र में अविरल बहने देंगे, जरा सोचिए!
’रणजीत कुमार झा, दिल्ली विश्वविद्यालय्

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