ताज़ा खबर
 

कसौटी पर शिक्षा

रैंक 200 के भीतर अन्य दो संस्थान आइआइटी मुंबई और आइआइएससी बंगलुरु हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत की स्थिति कितनी खराब है।

Author June 14, 2017 05:53 am
जब इस बारे में संपर्क करने पर एचआरडी मिनिस्ट्री ने कहा कि हाल ही के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में जीएटीई (गेट) के स्कोर के जरिए नियुक्तियां हो रही हैं और इनमें से कई लोग आईआईटी के हैं।

कसौटी पर शिक्षा

भारत के जिस संस्थान ने क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2018 में उच्चतम जगह पाई है वह है दिल्ली का आइआइटी। इसे 172वां स्थान मिला है। रैंक 200 के भीतर अन्य दो संस्थान आइआइटी मुंबई और आइआइएससी बंगलुरु हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत की स्थिति कितनी खराब है। हालांकि इस रैंकिंग की भी कुछ बिंदुओं पर आलोचना की जाती रही है कि इसके मानक पश्चिमी देशों के शिक्षा संस्थानों के ज्यादा अनुरूप हैं। इस आलोचना में कुछ हद तक सच्चाई भी है। इस रैंकिंग में आधे से ज्यादा अंक संस्थान की रोजगार प्रदाता की नजर में प्रतिष्ठा को दिए गए हैं। इस तरह के मानक में भारत के संस्थान पिछड़ जाते हैं।  इसके बावजूद भारत की उच्च शिक्षा की बदहाल स्थिति को नकारा नहीं जा सकता है। भारत में उच्च शिक्षा में कई तरह की गंभीर समस्याएं हैं। हर साल बड़ी संख्या में लाखों की तादाद में इंजीनियर-डॉक्टर निकल रहे हैं। बहुत अजीब लगता है जब एक उच्च शिक्षित इंजीनियर, प्राइमरी टीचर की नौकरी के लिए आवेदन करता है। बीच-बीच में ऐसी भी खबर आती है कि चपरासी पद के लिए पीएचडी वाले लोगों ने आवेदन किया। यह कल्पना से परे है कि एक व्यक्ति, जो शोध करके किसी सरकारी कार्यालय में बाबू या चपरासी की नौकरी करता होगा, उसे कितनी घुटन होती होगी! एक परिचित, जिसने एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय से गणित में एमएससी की थी, लेखपाल की नौकरी करने को बाध्य है। वजह उसे पता है कि सरकारी नौकरी ही सुरक्षा की गारंटी है। विदेशों में निजी क्षेत्र में भी उच्च शिक्षित लोगों के लिए बहुत अच्छे अवसर होते हैं पर भारत में यह अभी स्वप्न ही है कि निजी क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र से अच्छा और सुरक्षित हो सके।  शिक्षा में गुणवत्ता और उच्च शिक्षा संस्थान में प्रशासन जैसे मसलों पर भारत को ध्यान देने की विशेष जरूरत है। भविष्य में ज्ञान अर्थव्यवस्था पर अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए भारत को शिक्षा, खासकर उच्च शिक्षा को शीर्ष प्राथमिकता देनी चाहिए। अभी हाल में उच्च शिक्षा के लिए ‘हीरा’ (हायर एजुकेशन इंप्रूवमेंट रेगुलेशन एजेंसी) बनाने की घोषणा की गई है। आशा की जानी चाहिए कि यह पूर्व की खामियों को दूर करने में सहायक होगा।
’आशीष कुमार, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

खंडित नायक
हम सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने पर गर्व करते हैं, लेकिन क्या हमें सरकार, राज्य और राजा के बीच फर्क पता है? निस्संदेह यदि मतदाताओं को सही-गलत की समझ नहीं है, तो उनके वोट की कोई कीमत नहीं है। आज दुख की बात यह है कि हमारी युवा पीढ़ी ने अपने-अपने नायक खोज लिए हैं। चाहे वे मशहूर क्रिकेटर हों या फिल्म अभिनेता। इसी प्रकार आज राजनीति के क्षेत्र में भी मोदी, योगी या राहुल गांधी में नायकत्व की तलाश जारी है। पर देश का सच्चा नायक वह है जो लफ्फाजी में विश्वास न रखता हो, जनता की तकलीफों के प्रति संवेदनशील हो और सच में उसके लिए कुछ करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन हो। कुछ साल पहले खंडित नायकों के इस दौर में अण्णा हजारे गरीब-गुरबों की एक उम्मीद बन कर आए थे। लेकिन बहुत दुख की बात है कि अवसरवादियों ने उन्हें परिदृश्य से परे धकेल दिया।
’रमेश शर्मा, केशव पुरम, दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App