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जनसत्ता- उच्च शिक्षा का संकट

करीब 12,000 करोड़ रुपए की इस परियोजना को मंजिल तक पहुंचाने में अवसंरचना विकास लिमिटेड और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) मिलकर काम कर रहे हैं।
Author October 9, 2017 06:05 am
इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। (Express Photo)

विकास की कीमत

उत्तराखंड का खूबसूरत शहर देहरादून। इसके प्राकृतिक सौंदर्य और मानव बस्तियों के बसाहट पर भला कौन नहीं मोहित होगा! इसके भौगोलिक विस्तार के आगे जहां यूरोपीय आरामगाह पानी भरते नजर आते हैं तो भारत में इसे देवस्थल का दर्जा दिया जाता है। लेकिन अब यह भूभाग प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील होता जा रहा है। प्रधानमंत्री ने यहां चार धाम महामार्ग विकास परियोजना की आधारशिला रखी है। करीब 12,000 करोड़ रुपए की इस परियोजना को मंजिल तक पहुंचाने में अवसंरचना विकास लिमिटेड और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) मिलकर काम कर रहे हैं। यह महामार्ग केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री और टनकपुर जैसे धामों को आपस में जोड़ेगा जिससे यह यात्रा वर्षभर चलती रहेगी और ज्यादा से ज्यादा तीर्थयात्री पुण्य लाभ ले सकेंगे। इस महामार्ग की कुल लंबाई 900 किलोमीटर है। इस परियोजना के रास्ते में आने वाले 19,000 हजार नए-पुराने बेशकीमती शंकुधारी देवदार वृक्षों को काटा जाएगा। राष्ट्रीय हरित पंचाट की मानें तो यह परियोजना क्षेत्र भागीरथ ईको-सेंसिटिव जोन के नियमों का उल्लघंन कर रही है।

इस पर सीमा संड़क संगठन (बीआरओ) की दलील कितनी कारगार है यह तो समय ही बताएगा। उसका कहना है कि परियोजना सैन्य रणनीतिक लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है। चीन की सरहद इन क्षेत्रों के नजदीक है। इस वजह से सड़कों का जाल बिछाना जरूरी है जिससे भारतीय सैनिक हमले के हालात में तोप और गोला-बारूद की आपूर्ति कर सकेंगे। मगर सवाल है कि क्या यात्री वह सुकून की बयार महसूस कर पाएंगे जो शांति और अमन-चैन के लिए यात्रा करते हैं? फिलहाल, दूसरे सवाल का जवाब भविष्य के सैन्य हालात पर टीका है। बीआरओ की परियोजना पूरी हो जाने से वर्षभर चारधाम यात्रा तो चलती रहेगी मगर इस यात्रा और विकास की कीमत 19,000 देवदार वृक्षों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। यह कई हादसों की अशंका भी अपने गर्भ में समेटे है। भूस्खलन, बादल फटना, सूखा, जलस्तर का नीचे जाना सहित वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास के लिए भी यह खतरा है। कुलजमा सवाल है कि क्या इसे ही विकास का ब्लूप्रिंट कहते हैं?
’पवन मौर्य, औरंगाबाद महाराष्ट्र

उच्च शिक्षा का संकट

भारत में उच्च शिक्षा का संकट साल दर साल गहराता जा रहा है। पिछले कुछ सालों से तो यहां कुकुरमुत्तों की तरह निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों का जमावड़ा लग चुका है। चिंता की बात है कि ये संस्थान हमारे सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों को निगलते जा रहे हैं। इन निजी संस्थानों द्वारा गुणवत्ता, समता और आमजन की पहुंच तक के जो वादे किए थे, वे सब खोखले साबित हुए हंैं। निस्संदेह उच्च शिक्षा का यह निजीकरण राज्य के लोक कल्याणकारी चरित्र में आए बुनियादी बदलाव का सूचक है, जहां बाजार ही राज्य को संचालित करने लगा है। यह हमारी उच्च शिक्षा और राज्य के भविष्य के लिए शुभ नहीं है।
सही है कि भारत को अगर विकसित और खुशहाल देश बनाना है तो उच्च शिक्षा क्षेत्र का विस्तार करना आवश्यक है, लेकिन निजीकरण ही इसका हल है, यह समझ से परे है। देखा जाए तो विश्व के किसी भी अन्य हिस्से की तुलना में हमारे यहां शिक्षा में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा है। वैश्विक स्तर पर भी सत्तर प्रतिशत विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों में ही जाते हैं। लेकिन अफसोस है कि मुनाफे की बुनियाद पर टिकी हमारी ये निजी शैक्षणिक व्यवस्था भला क्योंकर बहुसंख्यक गरीब तबके के लिए उच्च शिक्षा के अवसरों का मार्ग प्रशस्त करेगी!
’रमेश शर्मा, दिल्ली

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