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भारत बढ़ती बीमारियों का देश बनता जा रहा है

हमारे यहां प्रसव के समय शिशु मृत्यु-दर प्रति एक हजार पर 52 है, जबकि श्रीलंका में यह 15, नेपाल में 38, भूटान में 41 और मालदीव में 20 है।
Author August 7, 2017 05:51 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (फाइल )

सेहत की सुध

आज किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी आबादी के अनुपात में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इस चुनौती से हम भारतीय भी अछूते नहीं हैं और पूरा भारत बढ़ती बीमारियों का देश बनता जा रहा है। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर मानक पर हम दुनिया के फिसड्डी देशों से होड़ करते दिखाई देते हैं। हमारे यहां प्रसव के समय शिशु मृत्यु-दर प्रति एक हजार पर 52 है, जबकि श्रीलंका में यह 15, नेपाल में 38, भूटान में 41 और मालदीव में 20 है। यहां स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का 70 प्रतिशत निजी क्षेत्र से आता है, जबकि इस मामले में वैश्विक औसत 38 प्रतिशत है।

संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के असमान वितरण के अलावा भारत में बीमारों की बढ़ती संख्या भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। मसलन, भारत में मधुमेह के मामलों की संख्या 2020 तक 3.6 करोड़ आंकी गई थी, लेकिन उससे पहले ही यह अब 7.5 करोड़ से भी आगे निकल चुकी है। जल्द ही दुनिया में हर पांच मधुमेह के रोगियों में एक भारतीय होगा। अगर ध्यान से देखें तो कई ऐसी बीमारियां हैं जिनका प्रत्यक्ष संबंध साफ-सफाई की आदतों से है। मलेरिया, डेंगू, डायरिया और टीबी जैसी बीमारियां इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हम सब अच्छी तरह समझते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए हर स्तर पर स्वच्छता आवश्यक है और इस तथ्य को हमारे महापुरुषों ने भी लगातार स्वीकारा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की जयंती पर स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था लेकिन वह कितना सफल रहा है, यह भी हम अच्छे से जानते हैं।

साफ-सफाई मानव स्वास्थ्य पर सीधा असर डालती है। जिन बीमारियों के मामले ज्यादातर सामने आते हैं और जिनसे ज्यादा मौतें होती हैं, अगर उनके आंकड़ों पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि शरीर की तथा परिवेश की साफ-सफाई वह अचूक मांग है जिसके जरिए न सिर्फ स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है बल्कि बीमारियों से लड़ने पर देश भर में हो रहा अरबों का सालाना खर्च भी बचाया जा सकता है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क की उत्पादकता बढ़ने से देश की उत्पादकता जो बढ़ेगी, सो अलग ही है। आज भारत के पास अपने नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रौद्योगिकी और ज्ञान का भंडार तो है, लेकिन यह भी सत्य है कि इस क्षेत्र में उपलब्ध सुविधाओं और आवश्यकताओं के बीच खाई निरंतर बढ़ रही है। इसके मद््देनजर आर्थिक विकास को स्वास्थ्य सुविधाओं के स्तर में सुधार लाने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए तभी हम विषमता रहित समाज और स्वस्थ राष्ट्र बनाने में सफल होंगे।
’पुष्पेंद्र सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय
उम्मीदों का बोझ
आज जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी अभिभावक अपने बच्चों से ढेरों उम्मीदें लगाए रहते हैं। उनकी रुचि जाने बगैर उनके अफसर, डॉक्टर या इंजीनियर बनने की चाहत पाल लेते हैं। नतीजतन, माता-पिता की उम्मीदों और अपनी ख्वाहिशों के बीच दब कर अक्सर बच्चा खुद को अकेला महसूस करता है और उम्मीदों के तले दब कर जिंदगी से हार जाता है। हाल ही में ऐसे दो मामले देखने को मिले, जहां एक तरफ पढ़ाई के टाइम टेबल को लेकर बेटी से बहस के बाद माता-पिता ने ख्ुादकुशी कर ली तो दूसरी तरफ एक छात्र ने जबरदस्ती इंजीनियरिंग कोर्स चुनने के कारण खुदकुशी की कोशिश कर डाली।
अभिभावकों को बच्चे की रुचि के मुताबिक विषय चुनने की आजादी देनी चाहिए। उन्हें अपनी उम्मीदों के चलते बच्चों की ख्वाहिशें नहीं दबानी चाहिए क्योंकि इस दौड़ में बेशक कोई जीते न जीते, पर जिंदगी जरूर हार जाती है।
’शालिनी नेगी, बदरपुर, नई दिल्ली

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