ताज़ा खबर
 

शर्मसार इंसानियत

इस बीच बच्ची के रोने पर युवकों ने उसका मुंह दबा कर सड़क पर फेंक दिया, जिससे बच्ची की मौत हो गई। यह घटना इस बात का सबूत है कि आज हमारे समाज में इंसानियत विलुप्त हो चुकी है।

Author June 14, 2017 5:58 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मुसीबत की खेती
खेती आज संकट का सबब बन गई है, यह हम नहीं राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े बता रहे हैं। पहले की तरह आज देश के किसी कोने में अनाज की कमी नहीं है। गांठ बांधने वाली बात यह है कि 2016-17 में देश में रिकॉर्ड पैदावार हुई है। दूसरी बात, इतनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को प्राप्त करने वाले देश का किसान बाजार के उतार-चढ़ाव में हाशिये पर हांफ रहा है। अनाज की पैदावार में भारी उछाल आया है, नतीजतन कीमतें धड़ाधड़ गिर रही हैं। इसका सीधा असर गरीब-खेतिहर आबादी पर पड़ रहा है। और इस बाजीगरी में मौत की काली चादर जंगल की आग की तरह फैल कर कितनों का घर जला देती है! राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के मुताबिक हमारे देश के 3,18,528 किसानों ने 1995-2015 के दौरान आत्महत्या की है। सरकारी आंकड़े के हिसाब से हर आधे घंटे में एक किसान मरता है।

वृद्धि दर के लक्ष्य को सरकार लड़खड़ाते-संभलते हुए पा लेती है और आंखों को चौंधियां देने वाले आंकड़े भी आ जाते हैं, पर इतना कुछ होने के बाद भी हिंदुस्तान में खेती-किसानी का हश्र आपके सामने है। बहुत नियम हैं, कायदे-कानून, सुविधाएं, योजनाएं, गोदाम, सरकार और सिपहसालार हैं। किसी को दोष नहीं देना है, वजीरे आला को नहीं कोसना है! पर समय आ गया है कि सभी पहलुओं पर तादात्म्य स्थापित करना होगा जिससे टिकाऊ विकास का ताना-बाना हरी फसलों की तरह फिर लहलहाने लगे।
’पवन मौर्य, बनारस
शर्मसार इंसानियत
हरियाणा के मानेसर में मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है। एक महिला 29 मई को अपनी नौ माह की बच्ची को लेकर देर रात गुड़गांव निकली थी। पहले उसने एक ट्रक में लिफ्ट ली, लेकिन ट्रक वाले की छेड़छाड़ से परेशान होकर वह उतर गई। किस्मत की मारी वह महिला एक आॅटो में बैठ गई जिसमें तीन युवक सवार थे। उन तीनों युवकों ने उस महिला से गैंगरेप किया। इस बीच बच्ची के रोने पर युवकों ने उसका मुंह दबा कर सड़क पर फेंक दिया, जिससे बच्ची की मौत हो गई। यह घटना इस बात का सबूत है कि आज हमारे समाज में इंसानियत विलुप्त हो चुकी है। हम लोग एक जंगल में रह रहे हैं जहां कदम-कदम पर जानवर घात लगाए बैठे हैं कि कब कोई अकेली औरत मिले और वे उसका शिकार कर लें। क्या हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं या बर्बर आदिम युग में लौट चुके हैं? इस तरह की वारदात करने वालों को कानून का कोई डर नहीं होता। जरूरत है ऐसे जानवरों को तुरंत सजा देने की ताकि लोगों के दिलों में कानून का डर पैदा हो।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App