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सोने की सीमा

सोना रखने की सीमा किसी महिला के वैवाहिक दरजे से तय करना एक बचकाना और जल्दबाजी में लिया गया फैसला है

Author December 6, 2016 4:15 AM
सोना।

इक्कीसवीं सदी में सोना रखने की सीमा किसी महिला के वैवाहिक दरजे से तय करना एक बचकाना और जल्दबाजी में लिया गया फैसला है। किसी का विवाह करना या न करना यह एक निजी विषय है। बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में महिलाओं का अविवाहित होना कोई बड़ी बात नहीं है। अविवाहित मातृत्व या अविवाहित अभिभावकत्व के विकल्प को भी कई महिलाएं स्वेच्छा से चुन रही हैं। जब महिलाओं को उनके वैवाहिक दरजे से कोई फर्क नहीं पड़ता तो सरकार को भी इसमें दखलंदाजी करने का कोई हक नहीं है। अगर सीमा तय करनी ही थी तो सबके लिए समान तय की जानी चाहिए।

संविधान में दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का भी तकाजा है कि सरकार को कानून बनाते समय यह जरूर सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी के लिंग और वैवाहिक दरजे के आधार पर उनके साथ भेदभाव न हो। अब वे पुरुष क्या करें जिन्हें सोना पहनना पसंद है? और उनका क्या जो खुद को न पुरुष श्रेणी में रख पाते हैं न महिला श्रेणी में?
किसी भी नियम को बनाने से पहले उसके सभी पहलुओं और सभी वर्गों की संवेदनाओं का ध्यान रखना जरूरी है। जल्दबाजी में लिए गए कच्चे-पक्के फैसलों से हुक्मरानों की गंभीरता पर प्रश्न उठना लाजिमी है।
’अश्वनी राघव, नई दिल्ली

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