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चौपाल: गांधी के साथ

मेरी नफरत महात्मा गांधी के खिलाफ धीरे-धीरे बढ़ती रही। गांधी को गाली देने का मैं कोई भी मौका नहीं छोड़ता।

Author नई दिल्ली | Published on: October 4, 2016 6:22 AM
महात्मा गांधी। (फाइल फोटो)

बचपन से ही मेरे जेहन में महात्मा गांधी के खिलाफ जहर भर दिया गया था। यह जहर मेरे कुछ सांप्रदायिक रिश्तेदारों ने भरा था। महात्मा गांधी को बिना पढ़े ही ये लोग उन्हें सांप्रदायिक, मनुवादी, अय्याश कहते थे तो मैं भी कहने लगा। मेरी नफरत महात्मा गांधी के खिलाफ धीरे-धीरे बढ़ती रही। गांधी को गाली देने का मैं कोई भी मौका नहीं छोड़ता। एक दिन हद कर दी मैंने, महात्मा गांधी की एक फोटो खरीदी और उसेअपमानित किया। बहुत बाद में मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जो समाज अपने महात्माओं की इज्जत नहीं करता वह बंजर हो जाता है; फिर वहां कोई महात्मा पैदा नहीं होते। ऐसा नहीं है कि मैं आज गांधीवादी हो गया हूं और अब मुझे महात्मा गांधी में कोई कमी दिखाई नहीं देती। पर अब मैं आंख बंद करके गाली नहीं देता बल्कि आंख खोल कर आलोचना करता हूं और यह मानता हूं कि गांधी महात्मा होते हुए भी एक इंसान थे जो दस काम सही तो एक काम गलत भी कर सकते हैं। हमें गांधी को उनकी संपूर्णता में देखना चाहिए।

महात्मा गांधी को दूसरे महात्मा जैसे आंबेडकर से लड़ा कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है। कुछ लेखक और लेखिकाएं उनके पुराने वक्तव्यों को उठा कर उन्हें मनुवादी घोषित करना चाह रहे हैं। महात्मा गांधी ने अपने बारे में कहा था कि ‘‘मैं लगातार सीखता रहता हूं इसलिए किसी विषय पर मेरी आखिरी बात क्या है यह याद रखो न कि मेरी पहली बात क्या थी?’’ गांधी को जातिवादी बोलने से पहले हमें उनकी जाति के ऊपर कही गई आखिरी बात याद करनी चाहिए। मैं यहां याद दिलाता हूं कि 1936 में जब पंजाब के ‘जाति तोड़ो मंडल’ ने बाबा साहब आंबेडकर को एक भाषण देने के लिए आमंत्रित किया तो बाबा साहब ने पहले ही अपना भाषण डाक से वहां भिजवा दिया। भाषण पढ़ कर जाति तोड़ो मंडल घबरा गया, जो जाति व्यवस्था के खिलाफ काम कर रहा था।

उसने आंबेडकर से विनती की कि आप भाषण काआखिरी का हिस्सा हटा दें जहां आपने लिखा है कि ‘एक हिंदू होने के नाते मेरा यह आखिरी भाषण होगा, इसके बाद मैं हिंदू नहीं रहूंगा क्योंकि जब तक मैं हिंदू हूं तब तक ब्राह्मणवादी व्यवस्था का हिस्सा रहूंगा’। इस भाषण को गांधीजी ने अपनी ‘हरिजन’ पत्रिका में वैसे का वैसे ही छाप दिया जिससे गांधी व्यक्तिगत रूप से असहमत थे! गांधी ने अपनी असहमति व्यक्त करते हुए पत्र लिखा। यह पत्र और उनका भाषण ही बाद में ‘जातीय विध्वंस’ (एनिहिलेशन आॅफ कास्ट) नाम से एक किताब की शक्ल में पूरी दुनिया में छपा।

आंबेडकर के साथ गांधी की इस बहस का असर गांधीजी पर गहरा पड़ा जो 1937 में वर्धा सम्मेलन में गांधी की शिक्षा नीति में सामने आता है। गांधी की ये ‘बेसिक शिक्षा’ आखिर थी क्या? यही न कि सभी विद्यार्थी शिक्षा के साथ उत्पादन कार्य से भी जुड़ें पर ब्राह्मण और क्षत्रिय तो उत्पादन कार्य के हिस्सा थे ही नहीं तो गांधी उनके बच्चों से भी उत्पादन क्यों करवाना चाहते थे? गांधी का मकसद साफ था, अगर सभी वर्गों और जातियों के बच्चे उत्पादन कार्य से जुड़ेंगे तो उनके अंदर एक आपसी समझ बनेगी, सामाजिक एकता कायम होगी, जातियों के बीच अलगाव खत्म होगा। आज की पीढ़ी फेसबुक और व्हाट्सअप पर आए संदेशों को अपने ज्ञान का स्रोत्र मानती है और इन्हीं घटिया संदेशों के आधार पर कई महात्माओं को गालियां बकती फिरती है। जरूरत इस बात की भी है कि नई पीढ़ियों तक सही बातें पहुंचाई जाएं ताकि वे निष्पक्ष होकर अपना नजरिया बना सकें।
’अब्दुल्लाह मंसूर, जामिया विश्वविद्यालय

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