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जनता का काम

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाने और केवल पंजाब को छोड़ कर समूचे विपक्ष का लगभग सफाया हो जाने के बाद दिग्गजों के तरह-तरह के बयान पढ़ने को मिल रहे हैं।

Prime Minister Narendra Modi, BJP President Amit Shahप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह। (PTI File Photo)

जनता का काम

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आ जाने और केवल पंजाब को छोड़ कर समूचे विपक्ष का लगभग सफाया हो जाने के बाद दिग्गजों के तरह-तरह के बयान पढ़ने को मिल रहे हैं। हैरानी की बात है कि कोई भी रणनीतिकार नहीं कह रहा है कि यह जनता, जो छोटे-छोटे घरों या झुग्गी झोपड़ियों में रहती है चाहे गांव की हो अथवा शहर की, उसमें भी स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा है। कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे राजनीतिक समझते हैं कि जनता पांच साल में सब कुछ भूल जाएगी। अब देखने में आया है कि जनता भी मुफ्त में कुछ नहीं लेना चाहती। उसे बेरोजगारी भत्ता नहीं चाहिए, पेंशन, लैपटाप, मोबाइल और कर्ज माफी की जरूरत नहीं। उसे बच्चों को अच्छी शिक्षा, चिकित्सा, भरपेट भोजन और सबसे ऊपर सुशासन अर्थात कानून का राज चाहिए। उसकी बच्चियां घर से निकलें तो घर वापसी में कोई डर या संदेह न हो।

आखिर विकास किसे कहते हैं? लगता है, यह कोई आयातित वस्तु है, जिस पर हमारे टीवी चैनलों पर बड़े-बड़े सूरमा बहस करते देखे जाते हैं। नदी किनारे पेड़-पौधे लगाए जाते हैं। वहां डामर और कंक्रीट का जाल नहीं बिछाया जाता। पूरे चुनाव के दौरान किसान और गरीब जनता की खुशहाली की कोई बात तक नहीं की गई। किसान की खुशहाली में फसल के लिए पानी, खाद और बीज की कोई बात ही नहीं कर रहा। तैयार फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा। औने-पौने दाम में फसल बेच कर किसी तरह किसान जी रहा है। शहरों में बीसों ‘ओवर ब्रिज’ बन सकते हैं मगर बहुत-से इलाकों में छोटी-छोटी नदियों पर छोटे पुल तक नहीं बने हैं। क्या यही विकास है?

स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर केवल ‘मिड डे मील’ और स्कूलों में अतिरिक्त कमरे बन रहे हैं। उनमें पठन-पाठन कितना हो रहा है, इसकी पूरे पांच साल कोई खबर नहीं लेता। सत्ता विरोधी रुझान कह कर जान छुड़ाई जाती है। क्या जनता को नहीं मालूम कि उसका विकास किया जा रहा है अथवा ‘टाइम पास’ किया जा रहा है! अब तो सांसद और विधायक विकास निधि भी मुहैया कराई जाती है। अगर किसी विधायक या सांसद ने काम किया है तो जनता भी देखती है और यही कारण है कि पांच साल या दस साल काट लीजिए, जैसे ही जनता को मौका मिलेगा उठा कर पटक देगी जैसा इस चुनाव में हुआ। जनता का काम भी चुनाव के संदर्भ में कुछ वैसा ही है जैसा कबीर के दोहे में माटी और कुम्हार का है।
’राजेंद्र प्रसाद बारी, इंदिरा नगर, लखनऊ

 

सद्भाव के शत्रु

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत मिले ज्यादा देरी नहीं हुई थी कि बरेली जिले के एक गांव में रातों-रात पर्चे लगे पाए गए, जिन पर लिखा था कि अब पूरे उत्तर प्रदेश में हिंदू शासन आ गया है। इस पर्चे में मुसलमानों को चेतावनी दी गई कि साल के अंत तक गांव छोड़ दिया जाए और अगर ऐसा नहीं किया तो परिणाम भुगतना पड़ेगा। पुलिस को इस बात की खबर की गई। उसने तहकीकात की, जिसका परिणाम आया कि यह कार्य किसका है इसकी जानकारी किसी को नहीं थी। गांव की आबादी ढाई हजार के लगभग है, जिनमें करीब दो सौ मुसलिम हैं और सभी का कहना है कि पूरे गांव में भाईचारे का माहौल है। वहां हिंदू-मुसलिम के बीच कोई भेदभाव नहीं। इस रिपोर्ट को देखते हुए यह बात सामने आती है कि क्यों कुछ कुंठित लोग समाज में सांप्रदायिकता का माहौल बनाने में लगे हुए हैं? मुसलमानों को अपना विरोधी कहने वाले लोग अगर ऐसे विवादास्पद कार्य करते रहेंगे, तो एक अच्छे समाज का नक्शा बिगड़ने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। ऐसी तुच्छ मानसिकता वालों का समाज के हर प्रत्येक को बहिष्कार करना चाहिए।
’आरिफ सैफी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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