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चौपाल: विभ्रम का वित्त

इससे सस्ते कर्ज की आस लगाए बैठे आम लोगों और कारोबारियों को निराशा हाथ लगी है।

Author February 20, 2017 03:50 am
अरुण जेटली

रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों जारी मौद्रिक नीति की समीक्षा में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया, जबकि अधिकतर अर्थशास्त्रियों ने ब्याज दरों में एक चौथाई फीसद कमी का पूर्वानुमान लगाया था। इससे सस्ते कर्ज की आस लगाए बैठे आम लोगों और कारोबारियों को निराशा हाथ लगी है। हालांकि रिजर्व बैंक ने आम लोगों के लिए राहत भरी खबर सुनाई कि बचत खाते से बीस फरवरी से पचास हजार रुपए हर हफ्ते निकाल सकेंगे और तेरह मार्च से नकद निकासी पर कोई पाबंदी नहीं होगी। लेकिन सवाल है कि बाजार में तरलता को सामान्य करने में चार महीने का समय (13 मार्च तक) क्यों लग गया? नोटबंदी के चलते करोड़ों लोगों को तकलीफें झेलनी पड़ीं, उन्हें राहत देने के लिए फौरी कदम सरकार ने क्यों नहीं उठाए? नोटबंदी के चलते लाखों लोगों के रोजगार छिन गए। उन्हें रोजगार दिलाने के लिए बजट में कदम क्यों नहीं उठाए? नोटबंदी के चलते अर्थव्यवस्था को क्या फायदा हुआ और होगा, उस पर सरकार मौन क्यों है? आम लोगों में धारणा बनी हुई है कि काला धन रखने वाले लोगों ने अपना पैसा सफेद करा लिया। इसकी पुष्टि ब्लूमबर्ग द्वारा जारी रिपोर्ट से होती है। 15.5 लाख करोड़ की चलन से बाहर की गई नकदी में से अधिकतर राशि (98 फीसद) वापस बैंकों में आ गई। जो एक-दो फीसद धनराशि बची हुई है, वह नेपाल और भूटान में फंसी हो सकती है। तो फिर काले धन से निपटने के लिए की गई नोटबंदी को क्या विफल माना जाए?

नोटबंदी को विफल होते देख सरकार ने पाला बदल लिया। आठ नवंबर को अचानक देश के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ उठाया सख्त कदम बताया था, लेकिन अब वे डिजिटल अर्थव्यवस्था का राग अलाप रहे हैं। तो क्या बिना नोटबंदी के अर्थव्यवस्था को डिजिटलीकरण की तरफ नहीं बढ़ाया जा सकता था? सवाल यह भी है कि सरकार ने बिना पर्याप्त मात्रा में नोट छपवाए हड़बड़ी में नोटबंदी का एलान क्यों किया? क्या इसका कारण पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव तो नहीं थे, जिनमें उत्तर प्रदेश के चुनाव को आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है। सरकार ने सोचा होगा कि नोटबंदी करके धनबल के प्रयोग को रोक सकेगी। अगर ऐसा है तो फिर ढाई साल से धनबल और बाहुबल को रोकने के लिए सरकार ने कदम क्यों नहीं उठाए? केवल अपनी चुनावी चिंता में 125 करोड़ लोगों को क्यों परेशान किया गया?

लेकिन नोटबंदी के चलते लगभग चालीस फीसद के आसपास बेहिसाबी धनराशि बैंकों में आई है। सरकार इस राशि का अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती को दूर करने में इस्तेमाल कर सकती है बशर्ते वह इसके लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए। अब तक सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन को रोकने के लिए जो कदम उठाए हैं वे नाकाफी हैं। देश में भ्रष्टाचार का घुन अर्थव्यवस्था को खोखला बना रहा है। हालांकि भ्रष्टाचार के मुद््दे पर नागरिक समाज और न्यायपालिका ने जरूर सक्रियता दिखाई है, पर यह तब तक काफी नहीं है जब तक सरकार प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक सुधारों के लिए कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाती। देश में समावेशी विकास और सुशासन की स्थापना के लिए भ्रष्टाचार पर एक सर्जिकल स्ट्राइक होनी चाहिए।
’कैलाश मांजु बिश्नोई, मुखर्जी नगर, दिल्ली

 

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